इंसानियत शर्मसार! 2.31 लाख का बिल न देने पर 8 घंटे तक रोके रखा शव, मानवाधिकार आयोग ने मांगा जवाब

Edited By Vatika,Updated: 15 Jul, 2026 09:04 AM

shame on humanity

महानगर के शेरपुर चौक के नजदीक स्थित एक नामी निजी अस्पताल द्वारा इंसानियत को शर्मसार करने और मृतक के परिजनों को मानसिक रूप

लुधियाना(राज): महानगर के शेरपुर चौक के नजदीक स्थित एक नामी निजी अस्पताल द्वारा इंसानियत को शर्मसार करने और मृतक के परिजनों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। सड़क हादसे में दम तोड़ने वाले गांव फुल्लांवाल के 22 वर्षीय नौजवान बूटा सिंह का शव अस्पताल प्रबंधन ने महज 2.31 लाख रुपये का मेडिकल बिल चुकता न होने के कारण करीब आठ घंटे तक रोके रखा। इस अमानवीय कृत्य और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का पंजाब राज्य एवं चंडीगढ़ मानवाधिकार आयोग ने बेहद कड़ा संज्ञान लेते हुए 'स्वतः संज्ञान' (Suo Motu) लिया है। आयोग ने लुधियाना के सिविल सर्जन को इस शर्मनाक घटना की विस्तृत तथ्यों के आधार पर तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने का कड़ा हुक्म जारी किया है।

हादसे ने छीना घर का चिराग, अस्पताल ने लाश पर लगाया 'दाम'
यह दर्दनाक और व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाला मामला बीती 13 अप्रैल को शुरू हुआ था। जानकारी के मुताबिक, लुधियाना के गांव फुल्लांवाल का रहने वाला 22 वर्षीय होनहार युवक बूटा सिंह (पुत्र शक्ति सिंह) गांव गिल के पास एक भीषण सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था। बदहवास परिजन उसे तुरंत इलाज के लिए शेरपुर चौक के पास स्थित एक बड़े निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। परिजनों ने अपने स्तर पर हर संभव प्रयास किया और डॉक्टर युवक की जान बचाने में जुटे रहे, लेकिन बदकिस्मती से उपचार के दौरान बूटा सिंह ने दम तोड़ दिया।

आठ घंटे तक गिड़गिड़ाते रहे गरीब परिजन, पत्थर दिल प्रबंधन ने एक न सुनी
युवक की मौत की खबर सुनते ही जहां परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, वहीं अस्पताल प्रबंधन ने एक नया और खौफनाक संकट खड़ा कर दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अस्पताल प्रशासन ने परिजनों के सामने 2 लाख 31 हजार रुपये का भारी-भरकम मेडिकल बिल थमा दिया और दोटूक कह दिया कि जब तक पूरी रकम कैश काउंटर पर जमा नहीं होगी, तब तक लाश को हाथ लगाने नहीं दिया जाएगा।अत्यधिक आर्थिक तंगी और अचानक लगे इस सदमे के कारण गरीब परिजन तुरंत इतनी बड़ी रकम का इंतजाम नहीं कर सके। मृतक के माता-पिता और रिश्तेदार करीब आठ घंटे तक अस्पताल के गलियारों में डॉक्टरों और प्रबंधन के आगे हाथ जोड़कर, रोते-बिलखते हुए शव सौंपने की गुहार लगाते रहे। चश्मदीदों के मुताबिक, लंबी मशक्कत, सामाजिक और राजनीतिक दबाव पड़ने के बाद ही अस्पताल ने भारी बेरुखी दिखाते हुए आखिरकार शव को परिजनों के हवाले किया।

जस्टिस संत प्रकाश की पीठ का हंटर— 'यह इंसानी अधिकारों का क्रूर हनन'
इस अमानवीय घटना की खबर मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद मानवाधिकार आयोग की उच्च स्तरीय पीठ, जिसमें जस्टिस संत प्रकाश (अध्यक्ष), जस्टिस गुरबीर सिंह और पद्मश्री जितेंद्र सिंह शंटी (सदस्य) शामिल हैं, ने इसका गंभीर नोटिस लिया। पीठ ने कहा कि किसी भी मृतक के शव को बिल के एवज में रोकना देश के कानून और बुनियादी मानवाधिकारों का सबसे क्रूर और जघन्य उल्लंघन है। आयोग ने मामले को बाकायदा एक औपचारिक शिकायत के रूप में दर्ज कर उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं।

अगली सुनवाई 5 अगस्त को; डायरेक्टर हेल्थ पंजाब को भी भेजी आदेश की कॉपी
मानवाधिकार आयोग ने लुधियाना के सिविल सर्जन को कड़े निर्देश जारी किए हैं कि वे इस पूरे मामले की गहराई से जांच करें कि अस्पताल ने किस आधार पर शव को इतनी देर तक रोके रखा और क्या वहां नियमों का उल्लंघन हुआ था। सिविल सर्जन को यह विस्तृत फैक्ट-रिपोर्ट अगली सुनवाई से ठीक एक सप्ताह पहले आयोग के समक्ष दाखिल करनी होगी। मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने अपने इस सख्त आदेश की एक प्रति पंजाब स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के निदेशक को भी आवश्यक और अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए भेजी है। इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली बड़ी सुनवाई 5 अगस्त को तय की गई है, जहाँ सिविल सर्जन और संबंधित अस्पताल के अधिकारियों को निजी तौर पर जवाबदेह होना पड़ेगा।

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