7 वर्षीय भतीजे की ह/त्या कर शव नहर में फेंका, आरोपी ताया को Court ने दी सख्त सजा

Edited By Kamini,Updated: 10 Jul, 2026 06:53 PM

nephew murdered and body dumped in canal

करीब 4 वर्ष पुराने बहुचर्चित अंधे कत्ल मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. रजनीश की अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए स्वर्ण सिंह निवासी अब्दुलापुर बस्ती को हत्या (धारा 302 IPC) एवं हत्या की नीयत से अपहरण (धारा 364 IPC) का दोषी करार दिया है।

लुधियाना (मेहरा): करीब 4 वर्ष पुराने बहुचर्चित अंधे कत्ल मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. रजनीश की अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए स्वर्ण सिंह निवासी अब्दुलापुर बस्ती को हत्या (धारा 302 IPC) एवं हत्या की नीयत से अपहरण (धारा 364 IPC) का दोषी करार दिया है। अदालत ने आरोपी को आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई तथा दोनों धाराओं के तहत ₹25,000-₹25,000 जुर्माना लगाया। जुर्माना अदा न करने पर प्रत्येक धारा में 6-6 माह का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा। दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी। यह मामला थाना मॉडल टाउन में दर्ज एफआईआर नंबर 159, दिनांक 19 अगस्त 2022 से संबंधित है।

मासूम के लापता होने से खुला हत्या का राज

अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता सिमरनजीत कौर निवासी अब्दुलापुर बस्ती ने पुलिस को बताया था कि उसका सात वर्षीय पुत्र सहजप्रीत सिंह 18 अगस्त 2022 की रात अचानक लापता हो गया। परिजनों ने काफी तलाश की, लेकिन जब उसका कोई सुराग नहीं मिला तो अगले दिन पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई। जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि घटना वाले दिन मृतक का ताया स्वर्ण सिंह उसे अपने मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले गया था। इसके बाद पुलिस ने वैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया। पूछताछ में आरोपी की निशानदेही पर मासूम का शव नहर से बरामद किया गया, जिससे यह मामला गुमशुदगी से हत्या में तब्दील हो गया।

संपत्ति के लालच ने बनवाया रिश्तों का कातिल

अभियोजन के अनुसार, जांच के दौरान आरोपी ने खुलासा किया कि उसकी अपनी भाभी के साथ अक्सर विवाद रहता था और वह स्वयं को अपमानित महसूस करता था। मृतक सहजप्रीत अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। आरोपी चाहता था कि भविष्य में परिवार की संपत्ति उसके अपने बच्चों को मिले। इसी लालच और रंजिश के चलते उसने अपने ही मासूम भतीजे की हत्या कर शव नहर में फेंक दिया।

सरकारी वकील की प्रभावी पैरवी से हुई दोषसिद्धि

विचारण के दौरान राज्य की ओर से डिप्टी जिला अटॉर्नी (सरकारी वकील) रमनदीप कौर गिल ने अभियोजन पक्ष की ओर से प्रभावी पैरवी की। उन्होंने परिस्थितिजन्य एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों, बरामदगी, फॉरेंसिक रिपोर्ट तथा गवाहों के बयानों को अदालत के समक्ष सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया। अभियोजन पक्ष की मजबूत दलीलों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी के विरुद्ध आरोप संदेह से परे सिद्ध मानते हुए उसे धारा 302 एवं 364 आईपीसी के तहत दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में दोषसिद्धि सुनिश्चित कराने में सरकारी वकील रमनदीप कौर गिल ने अहम भूमिका निभाई।

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की जीत

यह फैसला एक बार फिर साबित करता है कि अंधे कत्ल के मामलों में भी वैज्ञानिक जांच, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और प्रभावी अभियोजन के दम पर अपराधियों को कानून के शिकंजे तक पहुंचाया जा सकता है, भले ही घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी मौजूद न हो। अदालत का यह निर्णय ऐसे मामलों में मजबूत जांच और सशक्त पैरवी की अहमियत को भी रेखांकित करता है।

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