दिल्ली में सुलह, पंजाब में सस्पेंस: चन्नी की वफादारी के दावों के बीच क्या शांत हो गई वर्चस्व की जंग?

Edited By Vatika,Updated: 17 Jul, 2026 09:15 AM

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पंजाब कांग्रेस में पिछले कई दिनों से जारी अंदरूनी रस्साकशी के बीच दिल्ली से आई तस्वीरें और बयान एक नई सियासी

चंडीगढ़/बरनाला(विवेक सिंधवानी, रवि) : पंजाब कांग्रेस में पिछले कई दिनों से जारी अंदरूनी रस्साकशी के बीच दिल्ली से आई तस्वीरें और बयान एक नई सियासी कहानी बयां कर रहे हैं। जालंधर से सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की कांग्रेस आलाकमान के साथ हुई मैराथन बैठक के बाद यह दावा किया जा रहा है कि पार्टी में "आल इज वैल" है। लेकिन राजनीति के जानकार इसे सिर्फ 'तूफान से पहले की शांति' के रूप में देख रहे हैं। दिल्ली दरबार में हुई इस सुलह ने पंजाब की सियासत में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या चन्नी की वफादारी के दावों के बाद वाकई वर्चस्व की जंग शांत हो गई है, या यह आने वाले किसी बड़े सियासी फेरबदल का संकेत है?

दिल्ली में 'सरेंडर' या रणनीति के तहत नरमी?
दिल्ली में ए.आई.सी.सी. अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात के बाद चरणजीत सिंह चन्नी के सुर पूरी तरह बदले नजर आए। उन्होंने साफ कहा कि "हाईकमान का हर फैसला सर्वोपरि है" और वे पार्टी की विचारधारा के विपरीत जाने की सोच भी नहीं सकते। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि चन्नी के बयानों में यह नरमी आलाकमान के सख्त रुख के बाद आई है। दिल्ली ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि राज्य में किसी भी तरह की समानांतर गुटबाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। चन्नी द्वारा पंजाब कांग्रेस की कलह को 'मीडिया ट्रायल' करार देना असल में खुद को पूरी तरह निर्दोष साबित करने और विवाद पर तुरंत पर्दा डालने की एक कोशिश है।

पंजाब में सस्पेंस: चंडीगढ़ से मोरिंडा तक की कड़ियां
भले ही दिल्ली में 'सब ठीक है' का बोर्ड लगा दिया गया हो, लेकिन पंजाब कांग्रेस के भीतर का सस्पेंस खत्म नहीं हुआ है। मोरिंडा में चन्नी के घर और चंडीगढ़ में राणा गुरजीत सिंह के आवास पर हुई बैक-टू-बैक बैठकों ने प्रदेश नेतृत्व की रातों की नींद उड़ा दी थी। इन बैठकों को मौजूदा प्रदेश संगठन के खिलाफ एक बड़े मोर्चे के रूप में देखा जा रहा था। सुखजिंदर सिंह रंधावा (माझा) और चन्नी (दोआबा) जैसे दिग्गजों को एक साथ मंच पर लाना और उनके असंतोष को दूर करना आलाकमान के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। यही वजह है कि रणदीप सिंह सुरजेवाला को 'क्राइसिस मैनेजर' बनकर बीच-बचाव करना पड़ा।

वफादारी के बदले क्या मिलेगा इनाम?
राजनीति में कोई भी बयान बिना नफा-नुकसान के नहीं दिया जाता। चन्नी का आलाकमान के प्रति अटूट विश्वास जताना इस बात का साफ इशारा है कि पर्दे के पीछे कोई बड़ी डील या आश्वासन जरूर मिला है। कयास लगाए जा रहे हैं कि चन्नी को शांत रखने के लिए पार्टी संगठन या राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी भूमिका देने का मन बना चुकी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के हश्र से सबक लेते हुए, चन्नी ने पार्टी से टकराने के बजाय 'वफादार सिपाही' बनकर रहने में ही अपना राजनीतिक फायदा देखा है।

क्या वाकई शांत हो गई जंग?
 रणदीप सिंह सुरजेवाला की मध्यस्थता से पंजाब कांग्रेस का यह 'टाइम बम' फिलहाल के लिए डिफ्यूज जरूर हो गया है, लेकिन दरारें अभी भरी नहीं हैं। चन्नी और उनके समर्थक गुट को आने वाले दिनों में संगठन में क्या जगह मिलती है, उसी से तय होगा कि पंजाब कांग्रेस का यह 'आल इज वैल' कितना टिकाऊ है। आगामी सांगठनिक नियुक्तियां ही इस अस्थायी शांति का असली लिटमस टेस्ट होंगी।

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