Edited By Urmila,Updated: 10 Apr, 2026 10:08 AM

करीब 9 साल पहले लुधियाना के दुगरी थाने में हुई रमनदीप कौर उर्फ अलीशा की मौत का मामला आज भी न्याय की चौखट पर सवाल खड़ा कर रहा है।
लुधियाना (राज): करीब 9 साल पहले लुधियाना के दुगरी थाने में हुई रमनदीप कौर उर्फ अलीशा की मौत का मामला आज भी न्याय की चौखट पर सवाल खड़ा कर रहा है। हालांकि पुलिस, विशेष जांच टीम (SIT) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की रिपोर्टों का निष्कर्ष 'आत्महत्या' ही है, लेकिन इन रिपोर्टों के भीतर छिपे तथ्य एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं। जहां जिला पुलिस ने इसे एक सामान्य आत्महत्या का रूप दिया, वहीं SIT ने इसे पुलिसिया लापरवाही बताया और अब CBI की तफ्तीश ने तो खाकी के दामन पर जालसाजी और षड्यंत्र के गहरे दाग लगा दिए हैं। आरोप है कि मौत के बाद सबूत मिटाने के लिए जाली हस्ताक्षर किए गए और गवाहों को डराया-धमकाया गया।
मामले की शुरुआत 19 जुलाई 2017 को हुई थी, जब बलराम छिब्बर के खाते से 29 हजार रुपए गायब होने की शिकायत पर पुलिस ने मुकुल गर्ग और रमनदीप कौर को हिरासत में लिया था। 4 अगस्त की रात पुलिस दोनों को घर से उठाकर थाने लाई और मोबाइल व इलेक्ट्रॉनिक सामान जब्त कर लिया। नियम कहते हैं कि महिला को सूर्यास्त के बाद थाने नहीं लाया जा सकता और उसे महिला लॉकअप में रखा जाना चाहिए, लेकिन रमनदीप को गनमैन के रेस्ट रूम में रखा गया। सुबह करीब 6 बजे बाथरूम गई रमनदीप ने जब काफी देर तक दरवाजा नहीं खोला, तो पुलिस ने दरवाजा तोड़ा और पाया कि उसने दुपट्टे से फंदा लगा लिया था। आनन-फानन में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। उसके शव का पोस्टमार्टम करवा कर इसे मामली आत्महत्या करार देते हुए केस बंद कर दिया गया था।
मगर असली खेल मौत के बाद शुरू हुआ। मृतक महिला के मंगेतर मुकुल ने हाईकोर्ट में रिट दायर कर इंसाफ की मांग की। क्योंकि, पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उसके शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे और सब कुछ नियम के तहत हुआ। लेकिन जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा और SIT का गठन हुआ, तो पुलिस के झूठ की परतें खुलने लगीं। SIT ने अपनी जांच में पाया कि थाने में महिला लॉकअप होने के बावजूद रमनदीप को अलग कमरे में रखकर भारी लापरवाही बरती गई। फॉरेंसिक जांच में यह भी खुलासा हुआ कि रमनदीप के गिरफ्तारी और सर्च मेमो पर जो हस्ताक्षर थे, वे उसके बैंक दस्तावेजों के हस्ताक्षरों से मेल ही नहीं खाते थे। यानी पुलिस ने युवती की मौत के बाद खुद ही उसके जाली हस्ताक्षर किए ताकि कानूनी कार्रवाई को सही दिखाया जा सके।
लेकिन, CBI की जांच ने तो मामले को और भी गंभीर मोड़ दे दिया। CBI के अनुसार, तत्कालीन SHO दलबीर सिंह और ASI मंजीत सिंह ने न केवल बैक-डेट में दस्तावेज तैयार किए, बल्कि गवाहों को धमकाकर उनके बयान दर्ज करवाए। मौका-ए-वारदात से बरामद चाकू, चप्पल और दुपट्टा जैसे अहम सबूतों को मालखाने में दर्ज करने के बजाय गायब कर दिया गया। मेडिकल बोर्ड और AIIMS की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि रमनदीप की कलाई पर चोट के ऐसे निशान थे जो खुद बनाए गए थे (हिचकिचाहट वाले कट), जो शायद उसने आत्महत्या के प्रयास के दौरान लगाए होंगे।
सबसे हैरान करने वाला खुलासा यह था कि रमनदीप और मुकुल गर्ग पर दिल्ली, चंडीगढ़ और महाराष्ट्र में पहले से ही साइबर फ्रॉड के कई मामले दर्ज थे। CBI की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि पुलिस अधिकारियों ने उन्हें अवैध हिरासत में रखा और कबूलनामा लेने के लिए दबाव बनाया। हालांकि सीबीआई ने उच्चाधिकारियों पर भी कार्रवाई की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार से अनुमति न मिलने के कारण केवल निचले स्तर के कर्मियों पर शिकंजा कसा जा सका। अब अदालत ने पूर्व SHO दलबीर सिंह और पूर्व ASI मंजीत सिंह को समन जारी कर 1 मई को पेश होने का आदेश दिया है।
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