बरनाला नगर निगम में पंजाब केसरी का ‘रियलिटी चेक’, सुबह 9 बजे पहुंची टीम तो उड़े अफसरों के होश

Edited By Kamini,Updated: 13 Jul, 2026 02:26 PM

reality check at barnala municipal corporation

क्या सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाना और अपनी मर्जी से दफ्तर आना ही नगर निगम बरनाला की 'रूटीन प्रैक्टिस' बन चुका है?

बरनाला (विवेक सिंधवानी, रवि) : क्या सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाना और अपनी मर्जी से दफ्तर आना ही नगर निगम बरनाला की 'रूटीन प्रैक्टिस' बन चुका है? यह सवाल आज उस समय हकीकत बनकर सामने आया जब सुबह ठीक 9:00 बजे ‘पंजाब केसरी’ की टीम ने जनता से लगातार मिल रही शिकायतों के बाद नगर निगम बरनाला के दफ्तर में एक सरप्राइज ‘रियलिटी चेक’ किया। इस दौरान जो हैरान करने वाले तथ्य सामने आए, उन्होंने प्रशासनिक जवाबदेही के दावों की हवा निकाल दी है। एडवांस होते जा रहे जमाने में भी यहां का प्रशासन आखिरकार बायोमेट्रिक हाजिरी से क्यों भाग रहा है, यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

सुबह 9 बजे दफ्तर को ताला, बाहर खड़े अफसर करते रहे इंतजार

जब आम लोग अपने काम-काज के लिए दफ्तर पहुंचना शुरू होते हैं, वहां नगर निगम की डाक शाखा (जहां हाजिरी रजिस्टर होता है) का मुख्य कमरा ही ताला लगकर बंद पड़ा था। नियमों के मुताबिक जिस कर्मचारी की ड्यूटी रजिस्टर संभालने की है, उसे 10 मिनट पहले हाजिर होना चाहिए ताकि बाकी स्टाफ समय पर हाजिरी लगा सके। पर यहां सिस्टम का मजाक देखिए: एम.ई. सलीम मोहम्मद, जे.ई. निखिल कौशल और लखविंदर सिंह जैसे जिम्मेदार मुलाजिम खुद कमरा खुलने की उम्मीद में बाहर खड़े थे।

तकरीबन 15 से 20 मिनट की देरी के बाद जब कमरा खोला गया तो डाक शाखा के इंचार्ज खुद गायब थे। वहां मौजूद एक अन्य कर्मचारी ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया, "मैडम का फोन आ गया था, वह आधे दिन की छुट्टी पर हैं।" जब लिखित छुट्टी के बारे में पूछा गया तो मिले जवाब ने सिस्टम की पोल खोल दी: "यह हमारी रूटीन प्रैक्टिस है, जब हमें काम होता है, हम फोन पर ही नोट करवा देते हैं।" यह जवाब बताता है कि यहां लिखित नियम नहीं, बल्कि ‘फोन कल्चर’ चल रहा है।

51 में से सिर्फ 7 हाजिर: रजिस्टर से 'समय' ही गायब!

जब पंजाब केसरी’ की टीम ने दफ्तर के अंदर जाकर असल हाजिरी रजिस्टर की जांच की, तो आंकड़े सुन्न करने वाले थे। नगर निगम में कुल 51 मुलाजिम तैनात हैं, लेकिन सुबह सवा 9 बजे तक सिर्फ 7 कर्मचारियों की हाजिरी ही दर्ज थी। बाकी के 44 कर्मचारी और अधिकारी कहां थे? इसका जवाब किसी के पास नहीं था। इस जांच के दौरान एक और बड़ी खामी सामने आई। हाजिरी रजिस्टर में 'समय दर्ज करने' का कोई कॉलम ही नहीं था! यानी यदि कोई मुलाजिम लेट आकर भी हाजिरी लगाता है, तो यह पता ही नहीं लग सकेगा कि वह कितने बजे आया। आज के एडवांस जमाने में जहां छोटे से छोटे प्राइवेट दफ्तरों में भी एक-एक मिनट का हिसाब रखने के लिए बायोमेट्रिक मशीनें लगी हुई हैं, वहां नगर निगम बरनाला में जानबूझकर इस पुरातन सिस्टम को चलाया जा रहा है ताकि अफसरों की लेट-लतीफी पर पर्दा डाला जा सके।

'अतिरिक्त चार्ज' की आड़ में छिपा हुआ खेल

जब अलग-अलग ब्रांचों में जाकर गैर-हाजिर कर्मचारियों के बारे में पूछा गया, तो वहां मौजूद स्टाफ ने कहा, "साहब के पास अतिरिक्त चार्ज है, इसलिए वह आज दूसरी जगह गए होंगे।" पर अब इस बात की क्या गारंटी है कि वे अधिकारी सचमुच दूसरी जगह ड्यूटी निभा रहे हैं? क्या पता वहां भी यह कहा गया होगा कि साहब आज बरनाला गए हुए हैं! इस दोहरी गैर-हाजिरी के खेल के बारे में मौके पर हाजिर कर्मचारी कोई ठोस जवाब नहीं दे सके। यह 'अतिरिक्त चार्ज' का सिस्टम असल में जवाबदेही से बचने का सबसे सुरक्षित रास्ता बन चुका है। हालांकि कुछ कर्मचारियों के फील्ड या अतिरिक्त चार्ज पर होने की बात भी सामने आई, पर मौके पर ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वे किस ड्यूटी पर और कहां मौजूद हैं।

दर्जा बढ़ा, पर जनता पर वेतनों का अतिरिक्त बोझ

इस पूरी खबर का सबसे चिंताजनक पहलू बरनाला के नागरिकों की जेब पर पड़ रहा आर्थिक बोझ है। नगर कौंसिल को अपग्रेड करके 'नगर निगम' तो बना दिया गया, पर इसके क्षेत्रफल में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। बदला तो सिर्फ यह कि यहां कर्मचारियों और अफसरों की एक बड़ी फौज तैनात कर दी गई: पहले: जो काम सिर्फ 1 एम.ई. और 2 जे.ई. करते थे। अब: उसी काम के लिए 1 एस.ई., 1 एक्सियन, 1 एम.ई. और 9 जे.ई. यानी कुल 12 उच्च अधिकारी बिठा दिए गए हैं। इन सभी बड़े अफसरों की लाखों रुपयों की तनख्वाहों का अतिरिक्त बोझ बरनाला की जनता के टैक्सों पर पड़ रहा है। पर इस भारी-भरकम स्टाफ के बावजूद सुबह 9 बजे दफ्तर का खाली मिलना सिस्टम की नाकामी को बयां करता है।

मेयर हसनप्रीत भारद्वाज का बयान: "कसूरवारों के खिलाफ होगी सख्त कार्रवाई"

जब इस सारे मामले और लेट-लतीफी के बारे में नगर निगम के मेयर हसनप्रीत भारद्वाज से बातचीत की गई, तो उन्होंने सख्त रुख अख्तियार करते हुए कहा, "यह बहुत ही गंभीर मामला है। मैं खुद यह सुनिश्चित करूंगा कि सभी कर्मचारी और अधिकारी समय पर दफ्तर पहुंचें। जो भी मुलाजिम लेट आएंगे या बिना लिखित मंजूरी के गैर-हाजिर पाए जाएंगे, उनके विरुद्ध सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।" शहर वासियों का मानना है कि नगर निगम शहर की सफाई, विकास और बुनियादी सहूलियतों से सीधे तौर पर जुड़ा विभाग है। ऐसे में दफ्तरों में समय की पाबंदी, पारदर्शी हाजिरी प्रणाली और कर्मचारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना न सिर्फ प्रशासन की विश्वसनीयता बढ़ाएगा, बल्कि आम लोगों को भी समय पर बेहतर सेवाएं प्रदान करने में मददगार साबित होगा।

दाग हाजिरी पर नहीं, सिस्टम पर

इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह है कि दोष सिर्फ देरी से आने वाले मुलाजिमों का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जो खुद लापरवाही को ढकने का साधन बन चुका है। जब हाजिरी रजिस्टर में समय का कॉलम ही नहीं, तो देरी साबित करने का कोई रास्ता नहीं बचता - यह खामी इत्तेफाकन है या जानबूझकर रखी गई है, यह सवाल अब लोगों के मनों में उठ रहा है। दूसरी ओर नगर निगम का दर्जा बढ़ने से अफसरशाही की सीढ़ी तो लंबी हो गई, पर जवाबदेही उतनी ही कम रह गई - जितने ज्यादा पद, उतना ही आसान एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालना। सवाल यह है कि क्या सिर्फ मेयर के भरोसे से यह ढांचागत खामी दूर होगी, या बायोमेट्रिक हाजिरी जैसा ठोस कदम ही इसका असली हल है।

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