पंजाब के 19 जिले DARK ZONE में, पढ़ें हैरान कर देने वाली खबर

Edited By Kalash,Updated: 26 Jul, 2026 04:31 PM

punjab 19 district dark zone

वर्ष 2025 के दौरान जब बाढ़ आई तो लाखों क्यूसिक लीटर पानी बर्बाद हो गया।

अमृतसर (नीरज): वर्ष 2025 के दौरान जब बाढ़ आई तो लाखों क्यूसिक लीटर पानी बर्बाद हो गया। इस बार भी बारिश को देखकर ऐसे लगता है कि पता नहीं कितना पानी आ गया है लेकिन असल में जमीनी हकीकत यह है कि अमृतसर सहित पंजाब के 19 जिले व 117 ब्लॉक डार्क जोन में जा चुके हैं जबकि सरकार व प्रशासन का रेन वॉटर रिचार्जिंग सिस्टम की तरफ ध्यान नहीं है। जिसके चलते इस बार भी बारिश का लाखों लीटर क्यूसिक पानी गंदे पानी व सीवरेज में मिलकर बर्बाद हो जाएगा। सच्चाई यह भी है कि सेना के इलाके व इक्का-दुक्का पॉश कालोनियों को छोड़कर कहीं भी रेन वाटर रिचार्जिंग सिस्टम नहीं लगाया गया है जिससे बारिश का पानी सीवरेज में जाकर बर्बाद हो जाता है या फिर पाकिस्तान की तरफ चला जाता है

डार्क जोन व 156 प्रतिशत की दर से नीचे जा रहा भूजल

पानी के संकट की चर्चा में डार्क जोन की बात करें तो पता चलता है कि वह इलाका जहां जमीन के नीचे से पानी निकलने की रफ्तार, बारिश या प्राकृतिक स्त्रोतों से जमीन के अन्दर पानी जाने की रफ्तार से कहीं ज्यादा होती है। सैंट्रल ग्राऊंड वॉटर बोर्ड ने पानी के दोहन व रीचार्ज के अनुपात के आधार पर इलाकों को 4 श्रेणियों में बांटा है।

सुरक्षित इलाके : वह इलाके जहां भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से कम हो वह सेफ कैटेगरी में आते हैं।

सैमी क्रिटिकल इलाके : जहां भूजल दोहन 70 से 90 प्रतिशत के बीच हो वह इलाके सैमी क्रिटिकल इलाकों में आते हैं।

क्रिटिकल : वह इलाके जहां भूजल दोहन 90 से 100 प्रतिशत के बीच चल रहा हो। यह इलाके क्रिटिकल जोन में आते हैं और खतरे की घंटी इन इलाकों में शुरु हो जाती है।

सबसे खतरनाक कैटेगरी यानि डार्क जोन : वह इलाके जहां भूजल दोहन 100 प्रतिशत से अधिक चल रहा हो। यह इलाके डार्क जोन की कैटेगरी में आते हैं। नियमानुसार डार्क जोन वाले इलाकों में बोरवैल, ट्यूबवैल आदि खोदने पर मनाही होती है लेकिन विभागीय अधिकारियों की मिलीभुगत के चलते धड़ल्ले से ट्यूबवैल चल रहे हैं।

156 प्रतिशत की दर से भूजल दोहन 

सैंट्रल ग्राऊंड वाटर बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार भूजल दोहन (पानी निकालना) 156 प्रतिशत की दर से चल रहा है। जितना पानी जमीन के नीचे जा रहा है उससे कई गुना पानी ट्यूबवैल्स व अन्य संसाधनों से निकाला जा रहा है। देश में भूजल दोहन का अनुपात लगभग 60 प्रतिशत है जबकि पंजाब में 156 प्रतिशत की दर चल रही है।

रेवड़ियों की तरह बांटे ट्यूबवेल कुनैक्शन घर घर चल रहे सबमर्सीबल 

भूजल स्तर नीचे जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण समय-समय की सरकारों की तरफ से अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए किसानों को रेवड़ियों की भांति ट्यूबवैल कुनैक्शन बांटे गए इसकी तुलना में वाटर रिचार्जिंग की तरफ ध्यान नहीं दिया गया जिससे वाटर ऐमरजैंसी जैसे हालात पैदा हो गए। अंग्रेजों के जमाने में प्रयोग की जाने वाली हजारों किलोमीटर लंबी नदी नालों की चेन को तो बंद ही कर दिया गया और हर घर में सबमर्सिबल पंप लग गए।

नहरी पानी से फिर से शुरू हुई सिंचाई 

भूजल स्तर को ठीक करने के लिए सरकार की तरफ से फिर से नहरी पानी से फसलों की सिंचाई शुरू कर दी गई है। सिंचाई विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष लगभग 70 प्रतिशत धान की सिंचाई नहरी पानी से की जा रही है। इसमें यह भी सच है कि सबसे ज्यादा पानी धान की फसल को चाहिए होता है। एक किलो चावल उगाने के लिए हजारों लीटर पानी खर्च होता है। सरकार यह भी प्रयास कर रही है कि किसानों को गेहूं व धान के फसली चक्कर से निकालर कम पानी लेने वाली परंपरागत फसलों की तरफ आक्रशित किया जाए।

यू.बी.डी.सी. कनॉल वॉटर ट्रीटमैंट प्रोजैक्ट लेट 

महानगर में भूजल स्तर को ठीक करने के लिए सरकार की तरफ से 800 करोड़ रुपए से ज्यादा की लागत से यू.बी.डी.सी. कनॉल वॉटर ट्रीटमैंट प्रोजैक्ट बनाया जा रहा है। जिसके तहत नहरी पानी को साफ करके घर-घर में 24 घंटे व हर दिन साफ पीने का पानी मुहैया करवाया जाएगा लेकिन विभागीय अधिकारियों की मिलीभुगत के चलते यह प्रोजैक्ट अपने तय समय से काफी लेट चल रहा है जिससे सभी शहरवासी ट्यूबवैल्स से निकाले जाने वाले पानी पर निर्भर हैं और ट्यूबवैल्स में भी बोर इस समय 500 से 600 फुट तक नीचे जा चुके हैं क्योंकि इससे ऊपर साफ पानी ही नहीं मिलता है। यदि मिलता है तो वह पीने के काबिल ही नहीं है।

डार्क जोन वाले जिले 

जो जिले डार्क जोन में हैं उनमें अमृतसर, बरनाला, बठिंडा, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का, फिरोजपुर, गुरदासपुर, जालंधर, कपूरथला, लुधियाना, पठानकोट, मानसा, मोगा, पटियाला, रूपनगर, संगरूर, मोहाली व तरनतारन के नाम शामिल हैं। मालवा में तो डार्क जोन के साथ-साथ यूरेनियम का स्तर सुरक्षित सीमा से कहीं ज्यादा है।

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