किसान आंदोलन में विपक्ष को साथ न लेकर चलना सबसे बड़ी भूल थी - चढ़ूनी

Edited By Tania pathak,Updated: 15 Jun, 2021 07:31 PM

chadhuni gave big statement on kisan andolan

केंद्र सरकार की तरफ से लागू किए कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष करते किसानों को 7 महीने से जायदा समय बीत चुका है। लेकिन अभी भी इस मसले का हल निकलता नजर नहीं आ रहा है...

जालंधर (सोढी): केंद्र सरकार की तरफ से लागू किए कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष करते किसानों को 7 महीने से जायदा समय बीत चुका है। लेकिन अभी भी इस मसले का हल निकलता नजर नहीं आ रहा है। सरकार और किसान दोनों पक्ष अभी भी अपनी अपनी बात पर अड़े है। ऐसे में दिनों-दिन ये मामला और पेचीदा बनता जा रहा है। 1907 में भी कृषि कानूनों के खिलाफ आवाज़ बुलद की गई थी। उस समय आंदोलन का नेतृत्व अजीत सिंह की तरफ से किया गया था और एक बेहद प्रभावशाली विरोध लहर 'पगड़ी संभाल जट्टा' चलाया गया था। लेकिन अगर उसकी तुलना में अब के किसान आंदोलन की बात करें तो ये इतना प्रभावशाली नहीं रहा है। आंदोलन के 7 महीने से ज्यादा बीत जाने के बावजूद इस बारे में कोई फैसला नहीं निकल रहा है। 'पंजाब केसरी के साथ विशेष बातचीत में भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी ) हरियाणा के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा कि -'जो राजा या नेता हठ लेकर बैठ जाता है उसका न तो राज्य रहता है और न ही परिवार', आप चाहे रावण को देख लो या दुर्योधन को, दोनों का परिणाम एक जैसा ही था। वैसा ही बीजेपी के साथ होगा। चढ़ूनी ने कहा कि आज जिस स्तर का अंदोलन चला है, क्या उनकी औकात थी कि यह इतना बड़ा अंदोलन हो सकता था। 

11 बैठकों में एक भी फायदा नहीं बता पाई सरकार
जब कृषि मंत्री से कोई सवाल पूछा जाता है, उनके पास जवाब नहीं। 11 बैठकों में इन कानूनों से किसानों का फायदा पूछा गया लेकिन कोई फायदा नहीं बता सके। कोई तरीका तो बताएं कि इस कानूनों से किसानों का कोई फायदा होगा। उल्टा कृषि मंत्री ने कहा थी कि कानून में काला क्या है तो बकायदा किसानों ने एक किताब प्रकाशित कर सरकार तथा लोगों को भेजी है जिसमें सब साफ साफ लिखा गया है।  सरकार को चिठ्ठी लिखने के बारे में चढ़ूनी ने कहा कि उसका मकसद सिर्फ यह स्पष्टीकरण जारी करना था कि किसान मोर्चा भी बातचीत के लिए तैयार है। एक कॉल की दूरी है तथा चिट्ठी लिख कर यह साफ करने की कोशिश की गई है कि सरकार हठधर्मी पर अड़ी हुई है। 

कंट्रैक्ट फारमिंग से किसान को क्या मिल रहा
कंट्रैक्ट फारमिंग पर खेतीबाड़ी माहिर डा सरदारा सिंह जौहल की तरफ से 40 साल से मांग करने की बात पर चढ़ूनी का कहना है कि कांट्रेक्ट फारमिंग में आलू लेने का जब समय आया तो आलू सस्ता हो गया। एक स्टैंड्रड सैट कर दिया गया कि एक साईज से बड़ा या छोटा आलू नहीं लेंगे। सेब का 30 रुपए किलों रेट तय कर खरीद लिया, ग्रेडिंग की, मोम की स्प्रे की, स्टिकर लगाया तता 120 रुपए किलो बेच दिया। इसमें बताओ कि बीच का 90 रुपए का फायदा किसे मिला। किसान लहर के कम होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि-'हमारी लड़ाई जिंदा रहने की है, हम जिंदा रहने के लिए कुछ भी करेंगे। इतने लोग कुर्बानी दे चुके है अभी भी लाखों लोग तैयार है ऐसे में पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता।' 

एमएसपी की गारंटी दे सरकार
जब उनसे पूछा गया कि किसान आंदोलन के रद्द होने से क्या किसानों की सभी समस्याएं भी खत्म हो जाएंगी तो जवाब में उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों को रद्द करवाने के साथ-साथ उनकी एक मांग भी है कि किसानों को एम.एस.पी. की गारंटी भी दी जाएं ताकि अगर कम रेट भी मिले तो सरकार उसकी भरपाई करें। चढ़ूनी ने कहा कि पूरे देश में जो फसलें पैदा होती हैं, उसकी गारंटी दे सरकार। मक्के की फसल का 1860 रुपए एमएसपी तय हुआ लेकिन उस रेट पर बिकी नहीं। ऐसे में सरकार को तय करना चाहिए कि जो दाम पिक्स हो गया उससे कम पर जैसे भी फसल न बिके लेकिन बिक रही है तथा सरकार का कंट्रोल नहीं है। चढ़ूनी ने कहा कि यही सरकार से वो लोग कह रहे हैं कि तय किए रेट से कम पर चाह कर भी कोई फसल न तो बेच पाए तथा न कई खरीद पाए, इस तरह की व्यवस्था की जाए। 

26 जनवरी की घटना से हुआ नुक्सान 
चढ़ूनी ने कहा कि लोगों में अभी भी उतना ही रोष है जो पहले दिन था। हरियाणा में कई जगह रोष हुआ और लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। कई जगह पर हरियाणा में विधायकों को किसानों से बैरंग लौटाया। 26 जनवरी की घटना का आंदोलन पर बुरा असर नहीं पड़ा है। आज भी लोगों में उतना ही जोश है। चढ़ूनी ने कहा कि उनके आंदोलन को कई मीडिया ने अलग अळग तरीके से जाहिर किया। अडानी-अंबानी जैसे लोगों से संबंधित कई बड़े चैनल वालों ने उनके आंदोलन को खराब करने की कोशिश की लेकिन छोटे चैनलों ने किसान अंदोलन की बहुत मदद की। 

मेरा प्लान बहुत बड़ा था लेकिन...
चढ़ूनी ने कहा कि उनका किसान आंदोलन राकेश टिकैत के साथ ही मिल कर चल रहा है तथा चलेगा। राजनीतिक वग्रों के साथ मिलने के लिए उनकी जो प्लानिंग थी वह तो बेहतर थी। विपक्ष के लोगों के साथ मिलने के पीछे उनका एक मनोरथ था, उन्हें अपने साथ मिलाना। अगर सभी विपक्ष नेताओं को साथ लेकर चलते तो आज बात ही कुछ और होती। लीडरों को मंच पर न चढ़ाए न उनके मंच पर चढ़ाएं लेकिन उनका सहयोग की जरूर थी, संयुक्त किसान मोर्चा से यह गल्ती हुई है। अगर विपक्ष एकत्र हो कर प्रस्ताव पारित करती, जन संसद बुला कर किसान कानून को रद्द करवाने के लिए प्रस्ताव पारित किया जात तो आज भाजपा की सांस बंद हो चुकी होती चढ़ूनी ने कहा कि अगर ऐसा हो जाता तो 15 दिन में प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी नाक रगड़ते। अगर विपक्ष में नेता बैठे हैं, कानून को गल्त मानते हैं, तो बैठ कर कर क्या रहे हैं। अगर तो किसान कानून गलत लग रहे हैं तो हमारी तरफ लग जाएं वरना मोदी के पक्ष में चले जाएं। 

राजनीति में आने की मंशा नहीं
राजनीति में आने पर चढ़ूनी ने कहा कि अभी तक उनकी कोई मंशा नहीं है। राजनीति पाप नहीं है। किसी पार्टी के साथ संबंध पर उन्होंने कहा कि उनका किसी से कोई संबंध नहीं है। बेशक उन्होंने चुनाव लड़ा है। उनकी विचारधारा है कि अगर 35 प्रतिशत वोट वालों की सरकार हो सकती है तो 65 प्रतिशत लोग मिल कर विरोध क्यों नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि उनका चुनाव लड़ने का कोई प्लान नहीं है। अच्छे लोग राजनीति छोड़ गए बुरे लोग रह गए। चाणक्य की बात करते हुए चढ़ूनी ने कहा कि जब तक अच्चे लोग राजनीति में नहीं आते, बुरे लोग हम लोगों पर सत्ता करते रहेंगे। 

राकेश टिकैत के साथ रहा विवाद 
जानकारी के लिए आपको बता दें कि भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत से भी चढूनी के रिश्ते ठीक नहीं हैं। हाल ही में हिसार में भी राकेश टिकैत और चढूनी अलग दिखाई दिए। चढूनी ने संयुक्त किसान मोर्चे से अलग भारतीय किसान मजदूर फेडरेशन बनाकर ने यह साफ संकेत दे दिया कि वह संयुक्त किसान मोर्चे संगठन के साथ तो रहेंगे, लेकिन अपनी अलग राह पर चलते रहेंगे। इतना ही नहीं चढूनी ने उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में किसान आंदोलन नहीं चलने की बात कही थी। हालांकि इस बारे में टिकैत का नाम लिए बिना उन्होंने उत्तरप्रदेश के आंदोलन को विफल बताया था।

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