Edited By Urmila,Updated: 06 Apr, 2026 12:39 PM

देश भर में एलपीजी गैस की किल्लत के चलते आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। गैस सिलेंडर लेने के लिए लोग घंटों लंबी कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं।
मोगा (गोपी राऊके/कशिश) : देश भर में एलपीजी गैस की किल्लत के चलते आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। गैस सिलेंडर लेने के लिए लोग घंटों लंबी कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ किसान इस संकट के समय भी बिना किसी परेशानी के अपने घरों के चूल्हे जला रहे हैं। मोगा जिले के गांव राजेआना के किसान निर्मल सिंह इसका जीता-जागता उदाहरण हैं, जिन्होंने बायोगैस के जरिए आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है।
किसान निर्मल सिंह ने वर्ष 2011 में मात्र 20 हजार रुपये की लागत से अपने घर में बायोगैस प्लांट स्थापित किया था। इस प्लांट में पशुओं के गोबर और जैविक कचरे से गैस तैयार की जाती है, जिसका उपयोग रसोई गैस के रूप में किया जाता है। पिछले कई वर्षों से उनका परिवार इसी गैस से खाना बना रहा है। आज जब एलपीजी गैस की कमी के कारण लोग परेशान हैं और महंगे दामों पर सिलेंडर खरीदने को मजबूर हैं, वहीं निर्मल सिंह को इस समस्या का कोई असर नहीं पड़ा है। उन्हें न तो गैस एजेंसियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और न ही लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता है।
निर्मल सिंह का कहना है कि बायोगैस प्लांट ने उन्हें आर्थिक रूप से भी काफी राहत दी है। वर्षों में उन्होंने लाखों रुपये की बचत की है और पर्यावरण को भी सुरक्षित रखने में योगदान दिया है। इसके साथ ही बायोगैस प्लांट से निकलने वाला स्लरी (अपशिष्ट) खेतों के लिए जैविक खाद का काम करता है, जिससे फसल की पैदावार भी बेहतर होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अन्य किसान भी इस मॉडल को अपनाएं, तो न केवल एलपीजी पर निर्भरता कम होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और खेती में भी सुधार होगा। यह पहल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हो सकती है।
अपने शहर की खबरें Whatsapp पर पढ़ने के लिए Click Here