राजनीतिक जवाबदेही की नई मिसाल: गांव कुतबा के लोगों ने पारंपरिक और वर्तमान शासकों के खिलाफ खोला मोर्चा

Edited By Vatika,Updated: 03 Jul, 2026 09:44 AM

residents of kutba village have launched a campaign agains

पंजाब की सियासत में चुनाव के दिन नजदीक आते ही अक्सर गांवों में राजनीतिक नेताओं के डेरे लग जाते हैं, लेकिन

कुतबा (बरनाला) (विवेक सिंधवानी, रवि): पंजाब की सियासत में चुनाव के दिन नजदीक आते ही अक्सर गांवों में राजनीतिक नेताओं के डेरे लग जाते हैं, लेकिन बरनाला जिले के ऐतिहासिक गांव कुतबा से एक बिल्कुल अलग और जागरूकता भरी तस्वीर सामने आई है। यहाँ के लोगों ने किसी एक विशेष पार्टी का पक्ष लेने के बजाय, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों—कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी (आप)—को कटघरे में खड़ा कर दिया है। गांव की दीवारों पर लगे पोस्टर सिर्फ 'नो एंट्री' का ऐलान नहीं करते, बल्कि पिछले दशकों के दौरान पंजाब के सीने पर लगे जख्मों का लेखा-जोखा मांगते प्रतीत होते हैं।

पोस्टरों के जरिए राजनीतिक दलों पर तीखे प्रहार
  गांव के सार्वजनिक स्थानों और दीवारों पर लगाए गए बैनरों में हर पार्टी के गुनाहों की सूची सार्वजनिक की गई है:
शिरोमणि अकाली दल (बादल): पोस्टरों पर अकाली दल के चुनाव चिह्न 'तराजू' (तक्कड़ी) पर बड़ा लाल क्रॉस (X) लगाया गया है। इसमें बरगाड़ी गोलीकांड, पावन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी, अकाल तख्त साहिब के भगोड़े होने के आरोप और पंजाब की जवानी को चिट्टे (नशे) के इंजेक्शनों से मारने जैसे गंभीर आरोप लगाकर सौदा साध को माफी देने के मुद्दे पर घेरा गया है।

आम आदमी पार्टी (आप): वर्तमान मुख्यमंत्री भगवंत मान की तस्वीर पर बड़ा लाल क्रॉस लगाकर उन्हें 'गुरु द्रोही' (गुरु दोखी) और 'खालसा पंथ का विरोधी' करार दिया गया है। पोस्टर में संगत से अपील की गई है कि वे इस राजनीतिक नेतृत्व को मुंह न लगाएं। 

कांग्रेस: तीसरे पोस्टर में श्री दरबार साहिब (अमृतसर) पर हुए हमले की तस्वीर लगाकर 'कांग्रेस की पंजाब को देन' लिखकर ऐतिहासिक जख्मों को ताजा करते हुए कांग्रेसी नेताओं के बहिष्कार का आह्वान किया गया है।

बदलती ग्रामीण राजनीति का संकेत
 यह घटना सिद्ध करती है कि पंजाब का वोटर अब सिर्फ राजनीतिक नारों या चुनावी मुफ्तखोरी के जाल में फंसने वाला नहीं रहा। गांव कुतबा के लोगों ने यह साफ कर दिया है कि चाहे कोई पुरानी पारंपरिक पार्टी हो या बदलाव का दावा करके सत्ता में आई नई ताकत, जब तक वे पंजाब के हितों, धार्मिक भावनाओं और जवानी की रक्षा नहीं करेंगे, तब तक उन्हें गांवों की चौपालों (सत्थों) में घुसने की इजाजत नहीं दी जाएगी। यह राजनीतिक बहिष्कार किसी अराजकता का प्रतीक नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों से हिसाब मांगने का एक शांतिपूर्ण लेकिन बेहद असरदार जरिया बनकर सामने आया है। आने वाले दिनों में यह मोर्चा अन्य गांवों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।

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