झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को राहत, हाईकोर्ट ने सुनाया सख्त फैसला

Edited By Kalash,Updated: 13 Jan, 2026 11:50 AM

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रिहायश के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए हाईकोर्ट ने

चंडीगढ़ (गंभीर): पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पिटीशनर को सुनवाई का मौका दिए बिना या नोटिस जारी किए बिना पास किए गए तोड़-फोड़ के आदेश टिकाऊ नहीं थे। रिहायश के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए हाईकोर्ट ने हाल ही में चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा पास झुग्गी-झोपड़ियों को तोड़ने के दिए गए आदेशों को रद्द कर दिया। जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंद की बेंच ने झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की पिटीशन स्वीकार कर ली और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के अधिकारियों को उनके पुनर्वास के लिए फ्लैट की अलॉटमेंट के उनके दावे पर विचार करने के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि ये सब जानते हैं कि रिहायश का भारत के संविधान की धारा-21 के तहत एक मौलिक अधिकार है और पिटीशनर झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले होने के कारण फ्लैट अलॉट करने के लिए विचार किए जाने के पूरे हकदार हैं। अदालत ध्रुव और दूसरे झुग्गी वासियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिन्होंने अपने वकील के जरिए ये पेश किया कि वह झुग्गी वाली हैं और चंडीगढ़ स्मॉल फ्लैट स्कीम 2006 के तहत फ्लैट की अलॉटमेंट के योग्य हैं।  

यह दलील दी गई थी कि संबंधित अथॉरिटीज ने पिटीशनर्स को कोई नोटिस या सुनवाई का मौका दिए बिना ही तोड़-फोड़ के ऑर्डर जारी कर दिए थे। इसके अलावा यह भी कहा गया कि पिटीशनर्स ने फ्लैट अलॉट करने के अपने दावे पर विचार करने के लिए अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजा था पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। अदालत ने नोट किया कि पिटीशनर्स, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले होने के नाते, स्मॉल फ्लैट स्कीम 2006 के तहत फ्लैट की अलॉटमेंट के लिए विचार किए जाने के हकदार थे। बेंच ने फैसला सुनाया कि पिटीशनर्स को सुनवाई का मौका दिए बिना या नोटिस जारी किए बिना जारी किए गए तोड़-फोड़ के ऑर्डर टिकाऊ नहीं थे। इसलिए कोर्ट ने पिटीशन को स्वीकार करके तोड़-फोड़ के ऑर्डर रद्द कर दिए। अदालत ने अधिकारियों को झुग्गी वासियों के फ्लैट अलॉटमेंट के दावे पर विचार करने के निर्देश दिए।  

दो महीनें में अलॉटमेंट पर विचार करें अधिकारी

अदालत ने आदेश दिया कि रेस्पोंडेंट्स को निर्देश दिया जाता है कि वह पिटीशनर्स के पुनर्वास के लिए 2006 की योजना या किसी अन्य योजना के तहत फ्लैट्स की अलॉटमेंट पर विचार करे। इसमें दो महीने के अंदर एक आदेश पास करने का निर्देश दिया गया और कॉम्पिटेंट अथॉरिटी द्वारा अगले ऑर्डर जारी होने तक स्थिति ऐसी ही बनाई रखने के निर्देश दिए। फ्लैट्स के लिए झुग्गी में रहने वालों के क्लेम को खारिज करने वाले फैसले को रद्द कर दिया गया।

हाउसिंग बोर्ड के फैसले को भी किया गया रद्द

एक और मामले में कोर्ट ने पिछले महीने चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड (सी.एच.बी.) के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें चंडीगढ़ स्मॉल फ्लैट स्कीम 2006 के तहत कई झुग्गी में रहने वालों के फ्लैट्स के क्लेम को खारिज कर दिया गया था, यह कहते हुए कि यह ऑर्डर बिना कोई नोटिस जारी किए या उन्हें सुनवाई का मौका दिए बिना पास किया गया था। इसके बाद बेंच ने राजेश कुमार गिरी और अन्यों द्वारा फाइल की गई एक पिटीशन पर सुनवाई की, जिसमें उन्होंने कहा कि उनके केस एस्टेट ऑफिसर और सी.एच.बी. द्वारा ऑफिशियल कम्युनिकेशन के जरिए रिकमेंड किए थे, लेकिन बाद में अचानक खारिज कर दिए गए।

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