Edited By Kalash,Updated: 24 Sep, 2026 02:55 PM
दिवंगत पंजाबी गायक शुभदीप सिंह सिद्धू उर्फ सिद्धू मूसेवाला के पूर्व मैनेजर शगनप्रीत सिंह के माता-पिता द्वारा पुलिस कार्रवाई के संबंध में दायर याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किए हैं।
पायल/खन्ना (विनायक): दिवंगत पंजाबी गायक शुभदीप सिंह सिद्धू उर्फ सिद्धू मूसेवाला के पूर्व मैनेजर शगनप्रीत सिंह के माता-पिता द्वारा पुलिस कार्रवाई के संबंध में दायर याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किए हैं। जस्टिस मनीषा बत्रा की पीठ ने खन्ना में दर्ज तीन एफआईआर नंबर 67, 90 और 101 की जांच की निगरानी के लिए डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआईजी) रैंक से नीचे न होने वाले ऐसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की नियुक्ति के निर्देश दिए हैं, जो इन मामलों की जांच से सीधे तौर पर जुड़े न हों। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित वरिष्ठ अधिकारी तीनों मामलों की जांच की प्रगति पर नियमित निगरानी रखेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि जांच निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ तथा कानून के अनुरूप हो। साथ ही डीवीआर, एफएसएल रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने तथा उनकी कानून के अनुसार जांच सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
सीबीआई जांच और स्वतंत्र सिट की मांग फिलहाल खारिज
याचिकाकर्ताओं ने मामले की जांच स्थानीय पुलिस से हटाकर स्वतंत्र विशेष जांच दल (सिट) से करवाने अथवा केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने फिलहाल इन मांगों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई को जांच सौंपना या अलग सिट गठित करना असाधारण कदम है और केवल स्थानीय पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगाए जाने के आधार पर ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर यह मानने से भी इनकार किया कि पूरी राज्य पुलिस अथवा उसके वरिष्ठ अधिकारी निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं हैं। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की शिकायतों को पूरी तरह निराधार मानते हुए खारिज भी नहीं किया और इन्हें कानून के अनुसार जांच के अधीन रखने के निर्देश दिए।
पुलिस पर करीब 20 लाख रुपये मांगने का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने परिवार पर दबाव बनाया तथा करीब 20 लाख रुपये की कथित मांग की। यह भी आरोप लगाया गया कि परिवार को झूठे मामलों में फंसाने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी गईं। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि चूंकि आरोप स्थानीय पुलिस अधिकारियों पर ही लगाए गए हैं, इसलिए उसी पुलिस व्यवस्था के अधीन जांच जारी रहने से निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। इसी आधार पर स्वतंत्र सिट या सीबीआई जांच की मांग की गई थी। दूसरी ओर, पंजाब सरकार ने इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि संबंधित गिरफ्तारियां कानून के अनुसार की गई थीं।
सरकार ने कहा—डीवीआर केस प्रॉपर्टी के तौर पर कब्जे में लिया
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ताओं के घर से डीवीआर को एफआईआर नंबर 101 में केस प्रॉपर्टी के तौर पर कब्जे में लिया गया है और उसे फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) भेजा जा चुका है, जिसकी रिपोर्ट अभी प्राप्त नहीं हुई है। सरकार ने अवैध हिरासत, करीब 20 लाख रुपये की मांग तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को हटाने या नष्ट करने संबंधी आरोपों से इनकार किया। राज्य के अनुसार मामले की जांच संबंधित ड़ीएसपी की निगरानी में चल रही थी।
कई आपराधिक मामलों का हवाला देकर आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ताओं या उनके परिवार के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, उनके द्वारा लगाए गए आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत व्यक्ति के जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा गिरफ्तारी के दौरान प्राप्त कानूनी सुरक्षा का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी केवल आरोप लगाए जाने के आधार पर सामान्य तरीके से नहीं की जा सकती। गिरफ्तारी करने वाले अधिकारियों की पहचान, गिरफ्तारी मीमो तैयार करना, परिजन या मित्र को गिरफ्तारी की सूचना देना तथा गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना जैसी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है।
डीवीआर को महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य माना
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से डीवीआर के संबंध में कहा कि राज्य सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि डीवीआर पुलिस के कब्जे में है और इसे एफआईआर नंबर 101 में केस प्रॉपर्टी के रूप में दर्ज किया गया है। अदालत के अनुसार यह डीवीआर उस रात याचिकाकर्ताओं के घर में हुई घटनाओं से संबंधित महत्वपूर्ण रिकॉर्ड हो सकता है।
इसमें घर में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों की संख्या और पहचान, उनके प्रवेश का तरीका तथा समय जैसी महत्वपूर्ण जानकारी हो सकती है। इसलिए अदालत ने डीवीआर, एफएसएल रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज और अन्य संबंधित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने तथा कानून के अनुसार उनकी जांच सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा अवैध हिरासत, पैसे की मांग अथवा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हटाने या नष्ट करने संबंधी लगाए गए आरोपों पर कानून के अनुसार विचार किया जाए और मौजूदा आदेश में की गई किसी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना उनकी जांच की जाए।
2021 में बेटे से संबंध खत्म करने का दावा
याचिका दलजीत कौर और उनके पति सौदागर सिंह की ओर से एडवोकेट गौरव दत्ता और एडवोकेट मनीष मोदी के माध्यम से दायर की गई थी। याचिका के अनुसार दोनों गांव चारी, तहसील खमाणों, जिला फतेहगढ़ साहिब के निवासी हैं। सौदागर सिंह करीब दो दशक तक गांव के नंबरदार रहे हैं और याचिका में उनके किसी आपराधिक रिकॉर्ड से इनकार किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने अपने बेटे शगनप्रीत सिंह को वर्ष 2021 में सार्वजनिक नोटिस तथा सिविल कार्यवाही के माध्यम से परिवार से अलग और बेदखल कर दिया था। इसके बाद उनका बेटे से कोई संबंध नहीं रहा। याचिका में आरोप लगाया गया कि शगनप्रीत विदेश में रह रहा है और पुलिस उसके संबंध में परिवार पर दबाव बनाने के लिए माता-पिता को निशाना बना रही है। यह याचिकाकर्ताओं का पक्ष है, जिसे राज्य सरकार ने विवादित किया है।
एफआईआर नंबर 67 से शुरू हुआ मामला
याचिका के अनुसार मामला एफआईआर नंबर 67 से शुरू हुआ, जो 25 मार्च 2026 को थाना पायल में बीएनएस की धाराओं 308 और 351(2) के तहत डोनी बाल के खिलाफ दर्ज की गई थी। इसमें धमकी भरे फोन और फिरौती मांगने के आरोप थे। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि एफआईआर दर्ज होने के समय उनका नाम आरोपी के तौर पर नहीं था और बाद में सौदागर सिंह को जांच के दौरान प्राप्त जानकारी के आधार पर मामले में शामिल किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 29 और 30 मार्च की रात सादे कपड़ों में कुछ लोग उनके घर पहुंचे और सौदागर सिंह को अपने साथ ले गए। उनके अनुसार उस समय गिरफ्तारी का कारण नहीं बताया गया और न ही गिरफ्तारी मीमो दिया गया। बाद में पुलिस रिकॉर्ड में उन्हें गुप्त सूचना के आधार पर बस स्टैंड माजरी से गिरफ्तार किया जाना दर्शाया गया। राज्य ने इन आरोपों का विरोध किया और गिरफ्तारी को कानून के अनुसार बताया।
एफआईआर नंबर 67 में मिली जमानत का भी हवाला
याचिकाकर्ताओं ने लुधियाना के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 2 मई 2026 को पारित जमानत आदेश का भी हवाला दिया। उनके अनुसार सौदागर सिंह को एफआईआर नंबर 67 में नियमित जमानत प्रदान की गई थी। याचिका में कहा गया कि उस आदेश में यह तथ्य दर्ज था कि सौदागर सिंह ने शिकायतकर्ता को धमकी नहीं दी थी और उसे कोई वॉयस मैसेज नहीं भेजा था।
एफआईआर नंबर 90 में भी मिली नियमित जमानत
याचिका के अनुसार 24 अप्रैल 2026 को थाना दोराहा में एफआईआर नंबर 90 दर्ज की गई थी, जिसमें बीएनएस की धाराएं 308(4), 351(2) और 61(2) लगाई गई थीं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार सौदागर सिंह को इस मामले में प्रोडक्शन वारंट के माध्यम से गिरफ्तार किया गया और 15 मई 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, लुधियाना ने उन्हें इस मामले में भी नियमित जमानत दे दी।
ढाबे पर फायरिंग से जुड़ी तीसरी एफआईआर
याचिका में बताया गया कि 1 मई 2026 को थाना सिटी खन्ना में प्रेम वैष्णो ढाबे पर कथित फायरिंग के संबंध में एफआईआर नंबर 101 दर्ज की गई। इसमें बीएनएस की धाराओं 109, 308(4), 351(3), 61(2) तथा आर्म्स एक्ट की धाराएं लगाई गईं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार इस एफआईआर में शुरुआत में उनका नाम आरोपी के तौर पर नहीं था, जबकि उनके बेटे शगनप्रीत सिंह का नाम आरोपी के रूप में दर्ज था।
19-20 मई की रात पुलिस कार्रवाई का आरोप
याचिकाकर्ताओं के अनुसार वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, पंजाब के ड़ीजीपी तथा विजिलेंस अधिकारियों को शिकायतें देने के बाद 19 और 20 मई की रात पुलिसकर्मी दोबारा उनके घर पहुंचे। याचिका में आरोप लगाया गया कि दोनों याचिकाकर्ताओं को जबरन साथ ले जाया गया और पुलिसकर्मियों ने दीवार फांदकर घर में प्रवेश किया। इसके अलावा सीसीटीवी/डीवीआर सिस्टम, नकदी और सोने के आभूषण ले जाने के आरोप भी लगाए गए। हालांकि, इन आरोपों पर हाईकोर्ट ने इस स्तर पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन शिकायतों की जांच कानून के अनुसार की जानी चाहिए।
डीआईजी स्तर की निगरानी से जांच की निष्पक्षता पर जोर
हाईकोर्ट के आदेश का मुख्य बिंदु यह है कि एफआईआर नंबर 67, 90 और 101 की जांच अब ऐसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की निगरानी में होगी, जिसका रैंक डीआईजी या उससे ऊपर होगा और जो इन मामलों की प्रत्यक्ष जांच से जुड़ा नहीं होगा। संबंधित अधिकारी जांच की प्रगति की निगरानी करने के साथ यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए और जांच निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ तथा कानून के अनुसार आगे बढ़े। महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति: हाईकोर्ट के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामलों में आरोप सही या गलत साबित हो गए हैं। अदालत ने सीबीआई जांच अथवा अलग सिट की मांग फिलहाल स्वीकार नहीं की है और तीनों एफआईआर की जांच जारी रहने दी है, लेकिन उसकी निगरानी डीआईजी स्तर के स्वतंत्र वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को सौंपने के निर्देश दिए हैं।