कई आलीशान कॉलोनियों से बिल नहीं वसूल रहा निगम, विजिलेंस जांच शुरू, फंसेंगे कई अधिकारी

Edited By Sunita sarangal,Updated: 11 May, 2026 04:22 PM

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नगर निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है।

जालंधर(खुराना): नगर निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। शहर की 66 फीट रोड पर बनी कई आलीशान कॉलोनियों और ग्रुप हाउसिंग प्रोजैक्ट्स को पिछले करीब 5 वर्षों से पानी और सीवर की सुविधा तो लगातार दी जा रही है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि निगम ने इनसे आज तक रैगुलर रूप से पानी और सीवर के बिल तक वसूल नहीं किए।

इतना ही नहीं पुडा द्वारा पास की गई कई कॉलोनियों से लिए जाने वाले सीवरेज शेयरिंग चार्ज की सही गणना तक नगर निगम नहीं कर पाया। निगम अधिकारी यह भी तय नहीं कर सके कि कुल कितनी राशि बकाया है और पिछले वर्षों में निगम को कितना नुकसान हुआ।

मामला तब गंभीर रूप से सामने आया जब करीब तीन वर्ष पहले इस संबंध में स्टेट विजिलेंस ब्यूरो में शिकायत दर्ज करवाई गई। विजिलेंस जांच शुरू होने के बाद निगम अधिकारियों को तलब किया गया, जिसके बाद निगम ने माना कि जालंधर डेवलपमेंट अथॉरिटी से लगभग 25 करोड़ रुपए की राशि वसूली जानी बाकी है। निगम नराशि जमा करवाने के लिए बातचीत तो चलाई लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।

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2021 में दी गई थी 16 कॉलोनियों को सीवरेज की सुविधा

जानकारी के अनुसार वर्ष 2021 में 66 फीट रोड क्षेत्र की 16 पॉश कॉलोनियों और ग्रुप हाऊसिंग प्रोजैक्ट्स को नगर निगम ने सीवरेज सुविधा उपलब्ध करवाई थी। इन सभी कॉलोनियों का सीवरेज फोल्ड़ीवाल ट्रीटमैंट प्लांट से जोड़ा गया, जिसके रखरखाव पर नगर निगम हर वर्ष करोड़ों रुपए खर्च करता है।

तत्कालीन निगम कमिश्नर करनेश शर्मा ने उस समय स्पष्ट निर्देश दिए थे कि जे.डी.ए. द्वारा कॉलोनाइजरों से वसूले गए ई.डी.सी. चार्ज में से सीवरेज शेयरिंग कॉस्ट की राशि नगर निगम के खाते में जमा करवाई जाए।

इसी के तहत जेडीए ने 31 मई 2021 को नगर निगम को एक करोड़ रुपए का चेक भेजा था, जिसे निगम ने स्वीकार भी कर लिया। लेकिन इसके बाद बाकी राशि की गणना तक नहीं की गई।

पुरानी पॉलिसी के सहारे किया गया भुगतान

शिकायतकर्त्ता का आरोप है कि यह एक करोड़ रुपए की राशि उस पुरानी पॉलिसी के तहत भेजी गई थी जिसे पंजाब सरकार पहले ही रद्द कर चुकी थी। नई पालिसी लागू होने के बावजूद निगम और जेडीए अधिकारियों ने पुरानी पॉलिसी का हवाला देकर भुगतान प्रक्रिया पूरी की।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब भुगतान रद्द की जा चुकी पालिसी के आधार पर हुआ तो नगर निगम के ऑडिट और अकाउंट्स विभाग ने इस पर आपत्ति क्यों नहीं जताई। शिकायतकर्ता का दावा है कि पूरे मामले में गंभीर अनियमितता और विभागीय मिलीभगत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

80 से अधिक कॉलोनियों को नोटिस, फिर भी नहीं शुरू हुई वसूली

सूत्रों के अनुसार विजिलेंस जांच के बाद नगर निगम ने 66 फीट रोड क्षेत्र की 80 से अधिक कॉलोनियों को नोटिस जारी कर सीवरेज कनेक्शन की वैधता और शेयरिंग चार्ज संबंधी जानकारी मांगी थी।

अधिकारियों ने दावा किया था कि पुराने बकाए भी वसूले जाएंगे और नियमित बिलिंग भी शुरू की जाएगी, लेकिन आज तक न पुराने बिल वसूले गए और न ही नए बिल नियमित रूप से जारी किए जा रहे हैं।

सबसे हैरानी वाली बात यह है कि जिन कॉलोनियों को यह सुविधाएं दी गईं, वे शहर की सबसे महंगी और आलीशान कॉलोनियों में शामिल हैं, जहां फ्लैट्स और कोठियों की कीमत करोड़ों रुपए में है। ऐसे में इतने बड़े क्षेत्र को वर्षों तक मुफ्त पानी और सीवरेज सुविधा मिलना कई सवाल खड़े कर रहा है।

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पार्षद हाऊस से भी नहीं ली गई मंजूरी

जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि 66 फीट रोड पर नई सीवर लाइन डालने के लिए नगर निगम हाउस से औपचारिक मंजूरी तक नहीं ली गई। आरोप हैं कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में उस समय के निगम कमिश्नर करनेश शर्मा और अन्यों ने बिना हाउस प्रस्ताव के ही इस परियोजना को मंजूरी दे दी।

इस कारण न तो पार्षदों को इसकी जानकारी थी और न ही निगम की फाइलों में इस फैसले का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध है। लोकल बॉडीज़ विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी इस पूरे मामले की अलग से जांच कर रहे हैं।

अधिकारियों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जालंधर निगम को हुए इतने बड़े वित्तीय नुकसान और कथित लापरवाही के बावजूद अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई है।

सूत्रों का कहना है कि यदि विजिलेंस जांच की रफ्तार तेज हुई तो निगम और जे.डी.ए. में तैनात रहे कई मौजूदा तथा रिटायर्ड अधिकारियों से पूछताछ हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नगर निगम 25 करोड़ रुपए की बकाया राशि वसूल कर ले और पुड़ा द्वारा पास कॉलोनियों से नियमित पानी और सीवर बिल लेना शुरू कर दे तो निगम की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार आ सकता है।

लेकिन अधिकारियों की लापरवाही, विभागीय ढिलाई और कथित मिलीभगत के कारण करोड़ों रुपए अब तक सरकारी खजाने में जमा नहीं हो पाए हैं। अब सबकी नजर विजिलेंस जांच पर टिकी है कि आखिर इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाती है।

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