Punjab: इंटरनेशनल साइबर ठग गिरोह का भंडाफोड़, यूरोप-अमेरिका तक फैले तार

Edited By Kamini,Updated: 15 May, 2026 03:47 PM

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महानगर की साइबर क्राइम पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे एक बहुत बड़े ठग सिंडिकेट का पर्दाफाश करके देश के इतिहास की सबसे बड़ी कामयाबियों में से एक दर्ज की है।

लुधियाना (राज): महानगर की साइबर क्राइम पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे एक बहुत बड़े ठग सिंडिकेट का पर्दाफाश करके देश के इतिहास की सबसे बड़ी कामयाबियों में से एक दर्ज की है। यह गिरोह पंजाब में बैठकर यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अमीर देशों के नागरिकों को अपनी ठगी का शिकार बना रहा था। पुलिस ने इस मामले में एक साथ कई ठिकानों पर छापेमारी करके 132 आरोपियों को दबोचा है। 

इसके साथ ही करोड़ों रुपये की नकदी, 98 लैपटॉप, 229 मोबाइल और 19 लग्जरी गाड़ियां बरामद की गई हैं। पुलिस ने अब तक 300 से ज्यादा बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है और इस मामले में इनकम टैक्स विभाग को भी जांच में शामिल कर लिया है। पुलिस कमिश्नर स्वपन शर्मा ने बताया कि पुलिस को खुफिया सूत्रों से पक्की जानकारी मिली थी कि संधू टावर और सिल्वर ओक के पास कुछ फर्जी कॉल सेंटर चल रहे हैं, जहां से विदेशी नागरिकों को ऑनलाइन चूना लगाया जा रहा है। पुलिस की टीमों ने योजनाबद्ध तरीके से इन अवैध कॉल सेंटरों पर एक साथ रेड की और मौके से भारी तामझाम के साथ 132 शातिरों को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। मौके से 1 करोड़ 7 लाख रुपये की भारतीय करेंसी भी बरामद हुई है।

इस संबंध में थाना साइबर क्राइम लुधियाना में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट की विभिन्न संगीन धाराओं के तहत एफआईआर नंबर 37 दर्ज की गई है। इस अंतरराष्ट्रीय गिरोह के काम करने का तरीका बेहद हाईटेक और हैरान करने वाला था। ये लोग विदेशी नागरिकों के कंप्यूटर स्क्रीन पर माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के नाम से एक फर्जी पॉप-अप चेतावनी भेजते थे, जिसमें लिखा होता था कि उनके सिस्टम पर वायरस का बड़ा हमला हुआ है। इस पॉप-अप के आते ही पीड़ित का कंप्यूटर हैंग हो जाता था और स्क्रीन पर एक कस्टमर केयर नंबर दिखाई देता था। घबराकर जब विदेशी नागरिक उस नंबर पर फोन करता, तो इंटरनेट डायलर सॉफ्टवेयर के जरिए वह कॉल सीधा लुधियाना के इन फर्जी कॉल सेंटरों में ट्रांसफर हो जाती थी। यहां करीब 8 से 10 टीमें काम करती थीं, जिनमें 'ओपनर' और 'क्लोजर' नाम के एक्सपर्ट रखे गए थे। जैसे ही कॉल आती, तो 'ओपनर' मीठी-मीठी बातों में फंसाकर पीड़ित से अल्ट्रा-व्यूअर जैसा रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर डाउनलोड करवा लेता था।

इसके बाद कंप्यूटर का पूरा कंट्रोल ठगों के हाथ में आ जाता था। फिर वे स्क्रीन पर नकली स्कैन चलाकर पीड़ित को डराते थे कि उसका बैंक खाता हैक हो चुका है या उस पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी जैसे गंभीर आरोप लग सकते हैं। डरा-धमकाकर वे पीड़ित का बैंक अकाउंट और ईमेल खुलवा लेते थे और स्क्रीन शेयरिंग के जरिए सारा खुफिया डेटा चुरा लेते थे। इसके बाद खेल शुरू होता था 'क्लोजर' का, जो बैंक अधिकारी बनकर बात करता था। वह पीड़ित को डराता था कि उसका पैसा सुरक्षित नहीं है और उसे बचाने के लिए वह पीड़ित से अलग-अलग तरीकों से रकम ऐंठ लेता था।

ठगी के लिए वे पीड़ित के घर से कैश या सोना मंगवाते थे, अमेजॉन और एप्पल के गिफ्ट कार्ड खरीदवाते थे या फिर फर्जी विदेशी खातों में पैसे ट्रांसफर करवा लेते थे। विदेश में ठगी गई इस मोटी रकम को हवाला नेटवर्क, क्रिप्टो करेंसी और अन्य अवैध रास्तों से वापस भारत लाया जाता था। शुरुआती जांच में पता चला है कि यहां काम करने वाले हर लड़के-लड़की को फिक्स सैलरी के साथ-साथ तगड़ा इंसेंटिव भी मिलता था और हर ऑपरेटर रोजाना 8 से 10 विदेशी शिकार फंसाता था। पुलिस अब इस पूरे मामले की कड़ियों को जोड़ने, डिजिटल सबूतों को खंगालने और इस सिंडिकेट के पीछे छिपे बड़े मगरमच्छों तक पहुंचने के लिए छापेमारी कर रही है।

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