मौ/त से पहले लिखी वसीयत ने 26 साल तक उलझाए रिश्ते, हाईकोर्ट ने पलटा मामला

Edited By Urmila,Updated: 15 Sep, 2026 10:50 AM

high court raises questions about the will

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े करीब 26 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मृतक की ओर से मृत्यु से कुछ दिन पहले बनाई गई दोनों वसीयतों को संदिग्ध माना है।

चंडीगढ़ (गंभीर): पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े करीब 26 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मृतक की ओर से मृत्यु से कुछ दिन पहले बनाई गई दोनों वसीयतों को संदिग्ध माना है। अदालत ने कहा कि जब वसीयतकर्ता गंभीर रूप से बीमार हो और वसीयत बनाने के कुछ ही दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाए, तो यह साबित करना जरूरी है कि वह वसीयत के समय स्वस्थ मानसिक स्थिति में था और उसने अपनी स्वतंत्र इच्छा से दस्तावेज तैयार किया था। इस मामले में ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आया।

जस्टिस प्रोमोद गोयल ने मोहन सिंह की ओर से दायर नियमित दूसरी अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। विवाद सलविंद्र सिंह की संपत्ति को लेकर था। सलविंद्र सिंह अविवाहित और निसंतान थे। उनके भाइयों ने दावा किया कि उन्होंने एक अक्तूबर 1991 को वसीयत बनाकर सभी भाइयों को संपत्ति में बराबर हिस्सा दिया था। वहीं मोहन सिंह ने दावा किया कि सलविंद्र सिंह ने 25 सितम्बर 1991 को पूरी संपत्ति उनके नाम वसीयत कर दी थी। करनाल की निचली अदालत ने 25 सितम्बर की वसीयत को सही मानते हुए भाइयों का दावा खारिज कर दिया था। 

हालांकि प्रथम अपीलीय अदालत ने दोनों वसीयतों को संदिग्ध मानते हुए कहा कि संपत्ति का उत्तराधिकार वसीयत के बजाय कानून के अनुसार होगा। हाईकोर्ट ने पाया कि सलविंद्र सिंह की मृत्यु 3 अक्तूबर 1991 को हुई थी। यानी मोहन सिंह के पक्ष में बताई गई वसीयत उनकी मृत्यु से महज 8 दिन पहले और दूसरे पक्ष की वसीयत मृत्यु से सिर्फ 2 दिन पहले तैयार हुई थी। दोनों वसीयतें मूल रूप से अपंजीकृत थीं और 25 सितम्बर की वसीयत को उनकी मृत्यु के बाद 6 दिसम्बर 1991 को पंजीकृत करवाया गया।

अदालत ने कहा कि 25 सितम्बर की वसीयत के समय सलविंद्र सिंह अस्वस्थ थे और इलाज करवा रहे थे। इसके बावजूद वसीयत के लेखक और गवाहों ने यह नहीं बताया कि वह स्वस्थ मानसिक स्थिति में थे और दस्तावेज को समझ कर स्वतंत्र इच्छा से बना रहे थे। अदालत ने इसे गंभीर कमी माना। अदालत ने वसीयत की तारीख अलग स्याही से लिखे जाने, मृत्यु के बाद वसीयत पंजीकृत कराने का कारण स्पष्ट नहीं होने और गवाहों के स्टाम्प पेपर पर वसीयत तैयार किए जाने के दावे के विपरीत दस्तावेज का सादे कागज पर होने जैसी परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण माना।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृतक का मोहन सिंह के साथ रहना और उनके द्वारा देखभाल किया जाना उनके पक्ष में एक सकारात्मक तथ्य जरूर था, लेकिन अकेले यह तथ्य वसीयत पर उठे संदेह को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं था। अदालत ने दोनों वसीयतों को संदिग्ध परिस्थितियों से घिरा मानते हुए कहा कि इनमें से किसी को भी सलविंद्र सिंह की वैध वसीयत स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए मोहन सिंह की अपील खारिज कर दी।

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