Edited By Kalash,Updated: 05 May, 2026 11:47 AM

बरनाला की राजनीतिक फिजा आज एक ऐसी टक्कर की गवाह बन रही है जो सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सिद्धांतों और अहम की भी लड़ाई है।
बरनाला (विवेक सिंधवानी, रवि): बरनाला की राजनीतिक फिजा आज एक ऐसी टक्कर की गवाह बन रही है जो सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सिद्धांतों और अहम की भी लड़ाई है। एक तरफ कांग्रेस विधायक कुलदीप सिंह काला ढिल्लों हैं जो 6 मई से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठने का ऐलान कर चुके हैं। दूसरी तरफ पुलिस है जो कांग्रेसी नेताओं के विरुद्ध दर्ज एफआईआर रद्द करने से 17 दिन बाद भी इनकारी है। सवाल एक ही है कौन झुकेगा?
17 दिनों की खामोश लड़ाई
यह मामला कोई अचानक नहीं भड़का कांग्रेसी वर्करों और नेताओं पर दर्ज की गई एफआईआर को रद्द कराने के लिए कांग्रेस ने पिछले 17 दिनों से अलग-अलग तरीकों से अपनी आवाज बुलंद की पर न कोई सुनवाई हुई और न ही कोई हल निकला। सरकार और पुलिस दोनों ने खामोशी का रास्ता अपनाया जिस कारण विधायक काला ढिल्लों को भूख हड़ताल का सबसे तीखा हथियार उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
भूख हड़ताल - दबाव की राजनीति या सच्चा संघर्ष?
यह सवाल आज बरनाला की हर चाय की दुकान पर चर्चा का विषय है। कुछ लोग कहते हैं कि विधायक का यह कदम सच्चे दिल से अपने वर्करों के हक के लिए लड़ाई है। दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे दबाव की राजनीति के रूप में देखते हैं जिसके जरिए पुलिस और सरकार को एफआईआर रद्द करने के लिए मजबूर किया जा रहा है पर जो भी सच हो एक चुने हुए विधायक का भूख हड़ताल पर बैठना सरकार के लिए एक राजनीतिक संकट जरूर खड़ा करता है।
पुलिस का स्टैंड - जिद या फर्ज?
दूसरी तरफ पुलिस का कहना है कि एफआईआर कानून के मुताबिक दर्ज की गई है और बिना किसी कानूनी आधार के इसे रद्द नहीं किया जा सकता। पुलिस के इस स्टैंड को कुछ लोग कानून का पालन मानते हैं तो कुछ इसे राजनीतिक हिदायतों पर चलना। पर सवाल यह है कि जब एक विधायक भूख हड़ताल पर बैठता है, तो पुलिस और सरकार कितनी देर तक अपनी जिद पर कायम रह सकते हैं?
वर्करों का दर्द - असली मुद्दा
इस सारी राजनीतिक खींचतान में सबसे ज्यादा परेशान वे कांग्रेसी वर्कर हैं जिन पर एफआईआर दर्ज है। ये वे लोग हैं जो पार्टी के लिए मेहनत करते हैं और अब कानूनी पचड़े में फंसे हुए हैं। उनकी नजरें अपने विधायक की भूख हड़ताल पर टिकी हैं और वे यही चाहते हैं कि उनका नेता इस लड़ाई में जीते।
अब गेंद सरकार के पाले में
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भूख हड़ताल के बाद अब गेंद सरकार के पाले में है। यदि सरकार ने जल्द कोई फैसला न किया तो यह मामला और भड़क सकता है और राजनीतिक तौर पर सरकार के लिए मुश्किल बन सकता है। आज शाम तक स्थिति क्या रूप लेती है यह देखना बाकी है।
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