Edited By Urmila,Updated: 02 Mar, 2026 10:31 AM
पढ़ाई का बोझ कम करने और स्टूडैंट्स के मानसिक स्वास्थ्य के मद्देनजर सैंट्रल बोर्ड ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन (सी.बी.एस.ई.) ने सभी स्कूलों को पत्र जारी करके साफ तौर पर कहा हुआ है।
लुधियाना (विक्की): पढ़ाई का बोझ कम करने और स्टूडैंट्स के मानसिक स्वास्थ्य के मद्देनजर सैंट्रल बोर्ड ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन (सी.बी.एस.ई.) ने सभी स्कूलों को पत्र जारी करके साफ तौर पर कहा हुआ है कि हरेक क्लास के लिए प्रति वर्ष नया सैशन 1 अप्रैल से ही शुरू किया जाए लेकिन कई निजी स्कूलों ने सी.बी.एस.ई. के आदेशों की परवाह करना जरूरी नहीं समझा और इस बार बोर्ड कक्षाओं में एंट्री करने वाले विद्यार्थियों को मार्च के पहले हफ्ते से ही कक्षाएं लगाने के लिए बुला लिया है।
यही नहीं, स्कूलों ने अध्यापकों को भी अभी से ही सिलेबस बनाने और बोर्ड कक्षाओं को पढ़ाने के लिए पीरियड भी अलॉट कर दिए हैं। स्कूलों की इस मनमानी ने स्टूडैंट्स के साथ अध्यापकों की चिंता भी बढ़ा दी है।
कई नामी स्कूलों के अध्यापकों ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अभी स्कूल में 9वीं और 11वीं के रिजल्ट घोषित हो रहे हैं और मार्च के पहले हफ्ते से भी हमें इस बार की 10वीं और 12वीं को पढ़ाने के लिए भी कह दिया है जबकि अभी स्कूल में अन्य क्लासेज के पेपर चल रहे हैं। बोर्ड परीक्षा भी निरंतर चल रही है। जिन विषय विशेषज्ञ अध्यापकों की बोर्ड परीक्षा में मार्किंग के लिए ड्यूटी नहीं लगी है, उनको स्कूल में बैठकर अन्य क्लासेज के रिजल्ट तैयार करने के साथ इस वर्ष की बोर्ड कक्षाओं को पढ़ाने के लिए बाध्य किया जा रहा है जबकि अप्रैल से पहले तो बच्चे भी स्कूल आने को तैयार नहीं और न ही पेरैंट्स इतनी जल्दी बच्चों पर पढ़ाई का बोझ डालने को तैयार हैं।
अध्यापकों का तर्क भी है कि कम्पीटिशन के इस दौर में सभी स्कूल प्रिंसीपल और मैनेजमैंट पर्सैंटेज बढ़ाने के चक्कर में बच्चों के साथ अध्यापकों पर भी पढ़ाई का दबाव डालने में लगी हैं जोकि सही नहीं है। सी.बी.एस.ई. का साफ निर्देश है कि किसी भी क्लास के लिए नया सैशन अप्रैल में ही शुरू होना चाहिए लेकिन स्कूलों ने अपनी मनमर्जी करते हैं। यही वजह है कि 9वीं और 11वीं की परीक्षा भी जल्दी खत्म करवाकर रिजल्ट भी निकाल दिए हैं।
बोर्ड के नियमों के मुताबिक 1 अप्रैल से 31 मार्च तक का समय ही एक पूर्ण शैक्षणिक सत्र माना जाता है। इसके बावजूद शहर के विभिन्न स्कूलों ने फरवरी महीने में ही वार्षिक परीक्षाएं लेते हुए कक्षाएं शुरू कर दी हैं और कुछ स्कूल आने वाले कुछ दिनों में कक्षाएं शुरू करने जा रहे हैं। नियमों के इस खुले उल्लंघन से जहां अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है, वहीं विद्यार्थियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
सी.बी.एस.ई. और पंजाब सरकार के सख्त नियम
बता दें कि सी.बी.एस.ई. के साथ पंजाब सरकार ने भी शैक्षणिक कैलेंडर को लेकर कड़े निर्देश जारी किए हुए हैं। पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के नियमों के तहत मार्च का महीना केवल परीक्षाओं के मूल्यांकन और परिणाम तैयार करने के लिए आरक्षित है। बोर्ड का मानना है कि एक साल के कोर्स को कम समय में पूरा करने की कोशिश करने से विद्यार्थियों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है। समय से पहले सत्र शुरू करने वाली संस्थाओं के खिलाफ बोर्ड की संबद्धता रद्द करने तक की कार्रवाई का प्रावधान है। नियमों के अनुसार समय से पहले कक्षाएं शुरू करना विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के अधिकार का हनन है क्योंकि इससे उन्हें खेलकूद और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों के लिए समय नहीं मिल पाता।
क्या कहते हैं हैल्थ एक्सपर्ट्स
लगातार पढ़ाई और बिना किसी अंतराल के नए सत्र के भारी-भरकम सिलेबस में प्रवेश करने से विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। इस गंभीर विषय पर शहर के माहिर डॉक्टर हिमांशु आनंद ने कहा कि परीक्षाओं के तुरंत बाद बिना किसी ब्रेक के नई कक्षाएं शुरू करना विद्यार्थियों के लिए 'मैंटल फटीग' यानी मानसिक थकान का मुख्य कारण है।
बच्चों के मस्तिष्क को पुरानी पढ़ाई के दबाव से मुक्त होने और नई ऊर्जा संचित करने के लिए कम-से-कम 10 से 15 दिनों के अवकाश की सख्त जरूरत होती है। यदि उन्हें यह समय नहीं मिलता, तो उनकी सीखने की क्षमता कम हो जाती है और वे चिड़चिड़ेपन या तनाव का शिकार हो सकते हैं। डॉ. राजेश गौतम के अनुसार यह स्थिति बच्चों में 'बर्नआऊट' पैदा करती है जिससे लंबे समय में उनकी रचनात्मकता खत्म हो जाती है।
जायज है पेरैंट्स की चिंता
वहीं अभिभावकों का आरोप है कि स्कूलों द्वारा समय से पहले सत्र शुरू करने के पीछे मुख्य कारण उनका व्यापारिक दृष्टिकोण है जिसमें एडमिशन फीस, नई वर्दी व किताबों की बिक्री से होने वाला मुनाफा है। शहर के अभिभावकों का कहना है कि स्कूलों की इस मनमानी के कारण उन पर आर्थिक बोझ तो बढ़ ही रहा है, साथ ही बच्चों का बचपन किताबों के बोझ तले दबता जा रहा है।
जहां बोर्ड परीक्षाओं के सिलेबस का हवाला देकर स्कूल अपनी दलीलें दे रहे हैं, वहीं प्राइमरी कक्षाओं के बच्चों को भी इस दौड़ में शामिल करना चिंता का विषय बना हुआ है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस ‘प्रैशर कुकर’ वाली स्थिति में विद्यार्थी केवल सिलेबस रट रहे हैं, जबकि उनका मानसिक विकास कहीं पीछे छूट गया है।
अभिभावकों की प्रतिक्रिया
अभिभावकों के अनुसार “स्कूलों ने इसे पूरी तरह बिजनैस बना लिया है। अभी पुराने साल की फीस भरी ही थी कि नए साल की किताबें, वर्दी और बिल्डिंग फंड का बोझ डाल दिया गया। नियमों की परवाह किसी को नहीं है।
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