Teacher's Day: सरकारी अध्यापक अपने बच्चों को क्यों पढ़ाते हैं convent में?

Edited By Updated: 05 Sep, 2015 12:38 PM

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शिक्षा जो हमारे जीवन को गति देती है जिसके बिना हम अधूरे हैं। अाज वहीं शिक्षा देने वाले शिक्षक भेदभाव पर उतर अाए हैं।

जालंधरः शिक्षा जो हमारे जीवन को गति देती है जिसके बिना हम अधूरे हैं। अाज  वहीं शिक्षा देने वाले शिक्षक भेदभाव पर उतर अाए हैं।

सरकारी स्कूलों में जाकर देखा जाए तो वहां के बच्चों को अच्छी शिक्षा तो दूर की बात उन्हें जमीन पर बैठकर पढ़ना पड़ता है ।  सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर गरीब होने के नाते परिजन ध्यान नहीं दे पाते इसलिए इन स्कूलों के शिक्षक कभी उनको पीटीएम के लिए नहीं बुलाते अगर कभी परिजन स्कूल अा भी जाएं तो उलटा उन्हीं के बच्चों में गलती निकाल कर उन्हें मायूस कर वापिस भेज दिया जाता है। 

अगर यहीं शिक्षक बच्चों के गुरु बन जाएं तो उनका अच्छा मार्गदर्शन हो जाए लेकिन एेसा नहीं होता । जब बात शिक्षकों के अपने बच्चों की अाए तो वे कान्वेंट स्कूलों में जाते हैं जहां यही शिक्षक चाहते हैं कि उन्हें हर सुबिधा मिले,एेसा क्यों? जब सरकारी अध्यापकों को अपनी ही कार्यशैली पर संदेह है तो दूसरे उन पर विश्वास कैसे करें।

इसे विडंबना ही कह सकते हैं कि हम आज तक सर्व स्वीकार्य शिक्षा व्यवस्था कायम नहीं कर सके। उल्लेखनीय है कि तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद आज 19 वर्ष की आयु समूह में दुनिया की कुल निरक्षर आबादी का लगभग 50 प्रतिशत समूह भारत में है। 

शिक्षक और गुरु में  अंतर

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा के अनेक आयाम हैं, जो राष्ट्रीय विकास में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हैं। वास्तविक रूप में शिक्षा का आशय है ज्ञान, ज्ञान का आकांक्षी है-शिक्षार्थी और इसे उपलब्ध कराता है शिक्षक। तीनों परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बगैर दूसरे का अस्तित्व नहीं। इतिहास देखा जाए तो  भारत में ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु थे, अब शिक्षक हैं। शिक्षक और गुरु में काफी अंतर है। गुरु के लिए शिक्षण धंधा नहीं, बल्कि आनंद है, सुख है। शिक्षक अतीत से प्राप्त सूचना या जानकारी को आगे बढ़ाता है, जबकि गुरु ज्ञान प्रदान करता है।  

राष्ट्र निर्माण में युवा पीढ़ी की अहम भूमिका

राष्ट्र निर्माण में युवा पीढ़ी की अहम भूमिका है। इस संदर्भ में भारत की स्थिति अत्यधिक शर्मनाक और हास्यास्पद ही मानी जा सकती है। देश में लगातार हो रहे नैतिक एवं शैक्षणिक पतन से हमारे युवा वर्ग पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।  देश के विश्वविद्यालय प्रतिवर्ष बेरोजगार नौजवानों की फौज तो तैयार  कर रहे हैं लेकिन रोजगार कोई नहीं देता। परिणामस्वरूप मानव समाज आत्म केंद्रित और स्वार्थ केंद्रित होता जा रहा है।  

देश के कर्णधारों की कथनी-करनी के बीच बढ़ते अंतर ने मानव के बीच आस्था और विश्वास का संकेत खड़ा कर दिया है। व्यावसायिकता की आंच से मानवीय संवेदनाएं ध्वस्त हो रही हैं और हमारी कथित भाग्य विधाता शिक्षक समाज राष्ट्र में व्याप्त इस भयावह परिस्थिति को निरीह और असहाय प्राणी बनकर मूकदर्शक की भांति देखने को विवश हैं। 

 

  

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