Edited By Vatika,Updated: 27 Oct, 2026 11:25 AM

करवा चौथ को परंपरागत रूप से पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी द्वारा रखे जाने वाले व्रत के रूप में जाना जाता है,
जालंधर (बिमल राय): करवा चौथ को परंपरागत रूप से पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी द्वारा रखे जाने वाले व्रत के रूप में जाना जाता है, लेकिन बदलते समय के साथ इस पर्व को आपसी प्रेम, विश्वास और समानता के नजरिए से देखने की जरूरत भी महसूस की जा रही है। सवाल यह है कि जब पत्नी पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है, तो पति भी पत्नी की लंबी उम्र, सुख और सम्मान की कामना क्यों न करे?
भारतीय संस्कृति में करवा चौथ का विशेष धार्मिक और भावनात्मक महत्व है। यह पर्व पति-पत्नी के बीच प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, आज के बदलते सामाजिक परिवेश में दांपत्य जीवन में दोनों की भावनाओं, इच्छाओं और जिम्मेदारियों को समान महत्व देने की बात भी सामने आ रही है। विवाह केवल एक परंपरा या रिश्ता नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच आपसी समझ और साथ का नाम है। ऐसे में एक-दूसरे के स्वास्थ्य, खुशियों और लंबी उम्र की कामना करना दोनों की साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए। पत्नी की आस्था और समर्पण का सम्मान करने के साथ-साथ उसके भावनात्मक योगदान को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए।
समानता का अर्थ परंपराओं को छोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें आपसी सम्मान और समझ के साथ निभाना है। व्रत रखना या न रखना हर व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था का विषय है। किसी पर व्रत रखने का दबाव बनाना प्रेम या समर्पण का प्रमाण नहीं हो सकता।करवा चौथ की खूबसूरती तब और बढ़ सकती है, जब पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के सुखी, स्वस्थ और सम्मानपूर्ण जीवन की कामना करें। चांद के दीदार के साथ इस पर्व का संदेश केवल पति की लंबी उम्र तक सीमित न रहे, बल्कि दोनों के सुखद और मजबूत रिश्ते की कामना भी बने। आखिरकार, दांपत्य जीवन में प्रेम तभी सार्थक होता है, जब उसमें समानता, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति सम्मान हो। करवा चौथ का संदेश भी यही है कि साथ निभाने की कामना दोनों की हो और उस साथ में प्रेम के साथ बराबरी का भाव भी कायम रहे।