Edited By Kalash,Updated: 12 May, 2026 11:22 AM

फौजी सेवा के कारण डिसेबिलिटी के आधार पर रिटायर हुए आर्म्ड फोर्सेज के कर्मचारियों को उनकी डिसेबिलिटी पेंशन का अधिकार है
चंडीगढ़ (गंभीर): फौजी सेवा के कारण डिसेबिलिटी के आधार पर रिटायर हुए आर्म्ड फोर्सेज के कर्मचारियों को उनकी डिसेबिलिटी पेंशन का अधिकार है भले ही उन्होंने 15 साल का कम से कम सर्विस पीरियड पूरी न किया हो। इस टिप्पणी से पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भारत सरकार द्वारा दायर याचिका को रद्द कर दिया। जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की बेंच केंद्र की उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें सरकार को करीब 9 साल तक सेवा कर चुके लोगों को डिसेबिलिटी पेंशन देने का निर्देश दिया गया था।
बेंच ने अपने आदेशों में कहा कि पिटीशनर के वकील उन कानूनी सिद्धांतों का खंडन करने में समर्थ नहीं रहे है जिनके अनुसार अगर किसी अधिकारी की सर्विस 15 साल से कम है पर उसे सेवा के दौरान हुई इनकैबिलिटी के आधार पर रिटायर कर दिया गया है तो नियमों के अनुसार सर्विस पीरियड को ध्यान में रखा जाना चाहिए। केंद्र ने ए.टी.एफ. के मार्च 2022 के एक ऑर्डर को चुनौती दी थी, जिसमें सरकार को रेस्पोंडेंट को डिसेबिलिटी पेंशन देने का निर्देश दिया गया था, जिसने लगभग 9 साल आर्म्ड फोर्सेज में सेवा की थी।
सरकार ने तर्क दिया था कि रेस्पोंडेंट ने आर्म्ड फोर्सेज में सिर्फ 9 साल सेवा की थी, इसलिए वह डिसेबिलिटी पेंशन का हकदार नहीं है, क्योंकि सर्विस का कम से कम 15 साल का समय जरूरी है। जब रेस्पोंडेंट रिटायर हुआ, तो मेडिकल बोर्ड ने यह असेसमेंट किया था कि मिलिट्री सर्विस की वजह से रेस्पोंडेंट की बीमारी बढ़ गई थी, और उसकी डिसेबिलिटी की जिंदगी भर के लिए 30% असेसमेंट की गई थी। इसे देखते हुए उसे सर्विस के समय को छोड़कर पेंशन का फायदा पहले ही दिया जा चुका था। इसलिए सर्विस के समय को जोड़कर इसे रिवाइज करना गलत था।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही कर चुका है साफ
सभी पार्टियों को सुनने के बाद हाईकोर्ट बेंच ने कहा कि संबंधित अधिकारी के पास लाभ उठाने के लिए 15 साल की सर्विस नहीं थी, लेकिन यह कानूनी सवाल अब अनसुलझा नहीं है क्योंकि इस पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही फैसला कर चुका है। यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम वी.आर. नानुकुट्टन नायर के मामले में सुप्रीम कोर्ट इसी तरह के मुद्दे पर विचार कर रहा था। बेंच ने नतीजा दर्ज करते हुए याचिका खारिज कर दी कि उक्त पहलू कानून के स्थापित सिद्धांत के बावजूद भारत सरकार कानून के उपबंधों की अनदेखी करते हुए याचिका दायर कर रही है।
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