पंजाब में पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप से जुड़ी बड़ी खबर, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

Edited By Kalash,Updated: 30 Apr, 2026 11:22 AM

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अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना में कथित करोड़ों रुपये के घोटाले को लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को सख्त फटकार लगाई है।

चंडीगढ़ (गंभीर): अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना में कथित करोड़ों रुपये के घोटाले को लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को सख्त फटकार लगाई है। साल 2020 से लंबित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच में लंबी देरी को एक गंभीर प्रशासनिक असफलता करार दिया। लगातार न्यायिक सख्ती के बाद पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने करीब 6 साल बाद की देरी से 15 अप्रैल, 2026 को दो अलग-अलग FIR दर्ज की।     

हालांकि अदालत ने इस कदम को नाकाफी बताते हुए पंजाब के मुख्य सचिव को अगली सुनवाई में निजी रूप से जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए है। हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इतने बड़े वित्तीय घोटाले के आरोपों, ऑडिट, विभागीय जांच और कैबिनेट स्तर के फैसलों के बावजूद सालों तक सिर्फ जांच चलती रही पर अपराधिक कार्रवाई शुरू नहीं की गई।

अदालत ने सवाल उठाया कि जब करोड़ों रुपये के गलत इस्तेमाल के आरोप थे तो FIR दर्ज करने में इतनी देरी क्यों हुई। अदालत में दी गई जानकारी के मुताबिक पहली FIR मोहाली में स्थित विजिलेंस ब्यूरो के तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर परमिंदर सिंह गिल सहित कई अधिकारियों और बठिंडा के पॉलिटेक्निक संस्था के प्रबंधन के खिलाफ भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के तहत दर्ज की गई है।  

इस दौरान दूसरी FIR लुधियाना की आर्थिक अपराध विंग में फिरोजपुर स्थित शहीद भगत सिंह टेक कैंप इंजीनियरिंग विंग के प्रबंधन के खिलाफ दर्ज की गई है। यह मामला चंडीगढ़ के रहने वाले सतबीर सिंह वालिया की दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2019 में जारी 303.92 करोड़ रुपये में भारी बेनियमी हुई। खजाना रिपोर्ट के अनुसार 248.11 करोड़ रुपये निकाले गए जबकि करीब 39 करोड़ रुपये के भुक्तान संबंधी रिकॉर्ड मौजूद नहीं थे। 

पिटीशनर ने यह भी आरोप लगाया कि बाकी रकम पिछले सेशन के विद्यार्थियों के मेंटेनेंस अलाउंस के नाम पर निकाली गई और कुछ रकम संदिग्ध इंस्टीट्यूशन तक पहुंची। उन्होंने अदालत को बताया कि जनवरी 2020 में ऑडिट रिव्यू के आदेश दिए गए थे और मई 2020 की कैबिनेट मीटिंग में नाजायज दावों पर दंड ब्याज और बड़े मामलों में आपराधिक कार्रवाई का फैसला भी लिया गया था। इसके बावजूद FIR दर्ज न होना कोर्ट के लिए चिंता की मुख्य वजह बना। इस मामले में केंद्र सरकार ने 2022 में ही साफ कर दिया था कि यह केंद्र द्वारा स्पॉन्सर्ड स्कीम है और इसका फाइनेंशियल हिस्सा राज्य को जारी कर दिया गया है, लेकिन घोटाले से जुड़ी रिपोर्ट अभी तक केंद्र को नहीं भेजी गई है।

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