पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी की फांस: चुनावी चुनौती से पहले संगठनात्मक एकजुटता होगी बड़ी परीक्षा

Edited By Vatika,Updated: 17 Jun, 2026 11:16 AM

punjab congress

पंजाब विधानसभा चुनावों में अब करीब छह महीने का समय शेष है, लेकिन राज्य में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी

जालंधर( जतिंदर चोपड़ा): पंजाब विधानसभा चुनावों में अब करीब छह महीने का समय शेष है, लेकिन राज्य में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी दलों से मुकाबले से पहले अपने ही संगठन को एकजुट बनाए रखने की है। प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे को लेकर कई वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता ने पार्टी के भीतर गुटीय समीकरणों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व ने हालात का आकलन करने और संगठनात्मक एकजुटता सुनिश्चित करने के लिए तीन सदस्यीय समिति को मैदान में उतारा है।

66 नेताओं को दिल्ली बुलाकर बातचीत का सिलसिला किया शुरू
राजनीतिक गलियारों का मानना है कि पंजाब कांग्रेस लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेताओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझती रही है। जिसको लेकर आगामी विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी माहौल का लाभ उठाने की उम्मीद कर रही पार्टी के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह चुनावी रणनीति तय करने से पहले अपने आंतरिक मतभेदों को नियंत्रित करे। इसी उद्देश्य से पार्टी नेतृत्व ने वरिष्ठ नेताओं अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजन लाल जाटव के आधारित 3 सदस्यीय समिति को पंजाब मामलों की समीक्षा की जिम्मेदारी सौंपी है। समिति ने विगत कल से पंजाब के 66 नेताओं को दिल्ली बुलाकर उनसे अलग-अलग बातचीत का सिलसिला शुरू किया है। इनमें से 33 नेताओं से वन-टू-वन चर्चा कर संगठन की स्थिति, चुनावी तैयारियों और नेतृत्व से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत फीडबैक लिया गया है।

दरअसल, पंजाब में कांग्रेस की इस बार टक्कर सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के अलावा भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल से है। राज्य में एंटी-इंकम्बेंसी के बने माहौल के बीच कांग्रेस हाईकमान को पंजाब से उम्मीद बनी हुई है कि 2017 के विधानसभा चुनावों में पुनः सत्ता पर वापसी करेगी। पंजाब को लेकर पार्टी की दो दौर की बैठकें दिल्ली में हो चुकी है। दिल्ली में आयोजित बैठकों में कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्य अंबिका सोनी, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा, पूर्व मंत्री विजय इंदर सिंगला, पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजिंदर कौर भट्टल और शमशेर सिंह दूलो के अलावा सांसदों, विधायकों और प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों ने अपने विचार रखे। समिति पूर्व मंत्रियों और जिला कांग्रेस अध्यक्षों से भी मुलाकात कर रही है, ताकि जमीनी स्तर की वास्तविक स्थिति को समझा जा सके।

हालांकि पंजाब कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर औपचारिक रूप से कोई घोषणा नहीं हुई है, लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं की मुख्यमंत्री पद पाने की लालसा को लेकर बढ़ी राजनीतिक सक्रियता ने इस बहस को हवा दी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा को संभावित दावेदारों के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नेताओं का अपना-अपना जनाधार और क्षेत्रीय प्रभाव है। हालांकि, यही स्थिति कई बार संगठनात्मक समन्वय के लिए चुनौती भी बन जाती है। पिछले कुछ वर्षों में पंजाब कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन, मुख्यमंत्री चयन और संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर सार्वजनिक मतभेदों का भी सामना कर चुकी है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व इस बार किसी भी प्रकार के विवाद से बचते हुए सामूहिक नेतृत्व और संगठन आधारित चुनावी रणनीति पर जोर देता दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस हाईकमान की सक्रियता दे रही स्पष्ट संदेश
दिल्ली दरबार में लगातार हो रही बैठकों को कांग्रेस नेतृत्व की गंभीरता के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी इस बार चुनावी तैयारियों में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरतना चाहती। वरिष्ठ नेताओं से अलग-अलग राय लेने की प्रक्रिया का उद्देश्य केवल मतभेदों की पहचान करना नहीं, बल्कि सभी पक्षों को यह संदेश देना भी है कि संगठन सर्वोपरि है। कांग्रेस के पुष्ट सूत्रों के अनुसार, तीन सदस्यीय समिति अपनी रिपोर्ट तैयार कर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को सौंपेगी। इसी रिपोर्ट के आधार पर पंजाब में संगठनात्मक बदलाव, चुनाव प्रबंधन समितियों के गठन और विभिन्न जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं।

राहुल गांधी और खड़गे की भूमिका पर रहेगी सबकी निगाहें
पंजाब कांग्रेस के भविष्य की दिशा तय करने में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राहुल गांधी लगातार संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने पर जोर देते रहे हैं, जबकि खड़गे संगठनात्मक अनुशासन और सामूहिक नेतृत्व की वकालत करते रहे हैं। परंतु इतना तो तय है कि पंजाब में मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर कोई भी अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व की सहमति से ही होगा। इससे संभावित विवादों को सीमित करने में मदद मिल सकती है।
 

समिति की रिपोर्ट के बाद बदल सकते हैं समीकरण
दिल्ली में चल रही रायशुमारी केवल औपचारिक कवायद नहीं मानी जा रही। माना जा रहा है कि समिति की रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश संगठन में फेरबदल से लेकर चुनाव संचालन से जुड़ी समितियों के गठन तक कई महत्वपूर्ण फैसले लिए जा सकते हैं। जिला स्तर पर संगठन की सक्रियता बढ़ाने और गुटीय प्रभाव को सीमित करने की दिशा में भी कदम उठाए जा सकते हैं।

राहुल गांधी की पंजाब में प्रस्तावित बस यात्रा पर भी नजर
इसी बीच, राहुल गांधी की प्रस्तावित पंजाब यात्रा को लेकर भी पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी राज्य के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों को जोड़ने वाली एक विशेष बस यात्रा कर सकते हैं। इस यात्रा का उद्देश्य कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करने के साथ-साथ पार्टी की एकजुटता का संदेश देना होगा। संभावना जताई जा रही है कि इस दौरान पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एक मंच पर दिखाई देंगे।

कांग्रेस के लिए सत्ता प्राप्ति होगी चुनौती और अवसर
राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करें तो पंजाब कांग्रेस के सामने स्थिति दोहरी है। एक ओर सत्ता विरोधी रुझान को अपने पक्ष में करने का अवसर है, तो दूसरी ओर आंतरिक गुटबाजी उस संभावना को कमजोर भी कर सकती है। चुनावी सफलता के लिए पार्टी को नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं और संगठनात्मक हितों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। आने वाले दिनों में दिल्ली से मिलने वाले संकेत और समिति की रिपोर्ट यह तय करेगी कि पंजाब कांग्रेस चुनावी मैदान में एकजुट होकर उतरती है या फिर आंतरिक खींचतान उसके अभियान को प्रभावित करती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि आगामी विधानसभा चुनाव केवल विपक्ष के खिलाफ राजनीतिक मुकाबला नहीं होंगे, बल्कि कांग्रेस के लिए अपनी संगठनात्मक क्षमता और सामूहिक नेतृत्व की परीक्षा भी साबित होंगे।

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