2017 में लाल सिंह को सत्ता से दूर रखना कैप्टन अमरेंद्र और कांग्रेस को पड़ा भारी

Edited By Urmila, Updated: 01 May, 2022 10:56 AM

keeping lal singh out of power in 2017 was heavy

पंजाब कांग्रेस का ‘ब्रेन’ माने जाने वाले और पार्टी के भीष्म पितामह लाल सिंह को 2017 में विधानसभा की टिकट न देना और उनको सत्ता से दूर रखना कैप्टन अमरेंद्र सिंह और कांग्रेस पार्टी के लिए ...

पटियाला (राजेश पंजौला): पंजाब कांग्रेस का ‘ब्रेन’ माने जाने वाले और पार्टी के भीष्म पितामह लाल सिंह को 2017 में विधानसभा की टिकट न देना और उनको सत्ता से दूर रखना कैप्टन अमरेंद्र सिंह और कांग्रेस पार्टी के लिए हानिकारक साबित हुआ। लाल सिंह कांग्रेस के एकमात्र ऐसे नेता हैं जो 1975 से कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ते आ रहे हैं। एमरजैंसी के समय जब पूरे पंजाब में कांग्रेस का सफाया हो गया था तो उस समय लाल सिंह हलका डकाला (अब सनौर) से पहली बार विधायक बने थे और उसके बाद लगातार चुनाव जीतते रहे।
 
उन्होंने हमेशा कांग्रेस हाईकमान का आदेश माना और एक अनुशासित सिपाही की तरह पार्टी की मजबूती के लिए काम किया। पार्टी ने जिसको भी पंजाब कांग्रेस का प्रधान बनाकर भेज दिया, उसे लाल सिंह ने कामयाब किया। 1998 में कैप्टन अमरेंद्र सिंह को प्रधान बनाने के बाद उनको कामयाब करने और 2002 वाली कैप्टन सरकार को कामयाब करने में लाल सिंह का अहम रोल था। 2002 वाली सरकार में लाल सिंह वित्त मंत्री, ग्रामीण विकास व पंचायत मंत्री, सहकारिता मंत्री, सिंचाई मंत्री सहित कई अहम विभागों के मंत्री रहे। 

कैप्टन अमरेंद्र सिंह बेशक विधायकों को नहीं मिलते थे परन्तु लाल सिंह हमेशा ही विधायकों और कांग्रेसी नेताओं को संतुष्ट कर देते थे, यही कारण है कि जब 2004 में रजिन्द्र कौर भट्ठल ने कैप्टन अमरेंद्र सिंह के खिलाफ झंडा बुलंद कर दिया और 30 से अधिक एम.एल.ए. लेकर दिल्ली दरबार में एक महीने से अधिक समय तक बैठी रहीं, पर लाल सिंह के कारण कैप्टन अमरेंद्र सिंह की कुर्सी बची रही और 2007 के चुनाव में भी कांग्रेस 46 सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि 2022 में कांग्रेस को सिर्फ 18 सीटों पर सब्र करना पड़ा। 2017 में कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने लाल सिंह की टिकट इसलिए कटवाई कि वह पंजाब कांग्रेस में सबसे सीनियर हैं, यदि 2002 वाली सरकार वाले हालात पैदा हो गए और कांग्रेस हाईकमान उनसे नाराज हो गई तो लाल सिंह मुख्यमंत्री बन सकते हैं इसलिए लाल सिंह को हलका सनौर से टिकट नहीं दी। यदि लाल सिंह कैप्टन सरकार में मंत्री होते तो कैप्टन अमरेंद्र सिंह पूरे 5 साल मुख्यमंत्री रहते और 2022 के चुनाव में कांग्रेस की इतनी दुर्दशा नहीं होनी थी क्योंकि लाल सिंह को चुनाव लड़ने और चुनाव जीतने की महारत हासिल है। 

टिकट न मिलने पर पार्टी से नहीं की बगावत 
बेशक 2017 और 2022 में लाल सिंह को टिकट नहीं दी गई परन्तु फिर भी उन्होंने पार्टी से बगावत नहीं की और न ही पार्टी के खिलाफ बयानबाजी की। एक अनुशासित सिपाही की तरह पार्टी का हुक्म माना और पार्टी के लिए काम किया। यदि वह पिछली कांग्रेस सरकार में मंत्री होते तो जितने भी घटनाक्रम कांग्रेस की हार का कारण बने हैं, वह नहीं होते और कांग्रेस मजबूत स्थिति में रहती। 2022 में भी वह सनौर से टिकट मांगते थे और उसके बाद वह कैप्टन अमरेंद्र सिंह को पटियाला शहर से टक्कर देने के लिए तैयार हो गए थे परन्तु फिर भी कांग्रेस पार्टी ने उनको टिकट नहीं दी जिसका खमियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा और जिला पटियाला में कांग्रेस पार्टी का सफाया हो गया। 

कांग्रेसी कैडर लाल सिंह पर बेहद विश्वास करता है। वह जोड़-तोड़ की राजनीति के भी विशेषज्ञ हैं। यदि कांग्रेस पार्टी उनकी सेवाओं का लाभ लेती तो उसे 2022 में ऐसी बुरी हार नहीं देखनी पड़ती। कई कांग्रेसी नेताओं और वर्करों के साथ बातचीत करने पर उन्होंने भी कहा कि अगर हाईकमान लाल सिंह जैसे अनुशासित नेताओं के साथ ऐसा व्यवहार कर सकती है तो उससे आम वर्कर क्या आशा रख सकते हैं। जो नेता कांग्रेस हाईकमान को ब्लैकमेल करते रहे और उस पर दबाव डालते रहे, पार्टी के खिलाफ बयानबाजी करते रहे, उनको फिर भी टिकटें दी गईं परंतु लाल सिंह जैसे नेता को टिकट न देकर उन्हें अनदेखा कर दिया जिसका खमियाजा कैप्टन अमरेंद्र सिंह और कांग्रेस को भुगतना पड़ा है। 

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