Edited By Vatika,Updated: 14 May, 2026 12:28 PM

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने रिश्वतखोरी के एक मामले में पर्यवेक्षण संबंधी चूक के आरोपी भारतीय खाद्य निगम (एफ.सी.आई.) के एक कर्मचारी
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने रिश्वतखोरी के एक मामले में पर्यवेक्षण संबंधी चूक के आरोपी भारतीय खाद्य निगम (एफ.सी.आई.) के एक कर्मचारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। जस्टिस संदीप मौदगिल ने ओम प्रकाश द्वारा दायर याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि सजा में तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब वह कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर दे। ओम प्रकाश एफ. सी. आई. में तकनीकी सहायक थे और उन्होंने 20 अक्तूबर, 2023 के उस समीक्षा आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें अनिवार्य रूप से सेवा से सेवानिवृत्त कर दिया गया था। मामले की सुनवाई के बाद दिया गया निर्णय कहता है कि इस दंड को न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोरने वाला नहीं कहा जा सकता। यह दुराचार खाद्यान्न खेप स्वीकार करने से जुड़े एक संवेदनशील क्षेत्र में कर्तव्य की उपेक्षा से संबंधित है। ऐसी परिस्थितियों में अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दंड इतना अनुचित नहीं कहा जा सकता कि इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। याचिकाकर्त्ता सेवा की निरंतरता और बकाया सहित सभी परिणामी लाभों के साथ फिर से नियुक्ति की मांग कर रहा था।
जांच में कुछ भी अनुचित नहीं पाया गया
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक मामलों में हस्तक्षेप केवल तभी उचित है जब परिणाम विकृत हों, बिना किसी साक्ष्य के आधारित हों या जहां निर्णय लेने की प्रक्रिया अवैध हो। याचिकाकर्त्ता द्वारा उठाया गया यह तर्क कि उससे कोई बरामदगी नहीं की गई या जांच के दौरान पेश किए गए साक्ष्य अपर्याप्त थे, हाईकोर्ट द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता था। अदालत ने उल्लेख किया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन की दलील भी उतनी ही निराधार थी, क्योंकि अदालत ने पाया कि जांच की कार्रवाई में किसी भी प्रकार की प्रक्रियात्मक अनुचितता नहीं थी। हाईकोर्ट ने कर्मचारी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया और अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा को बरकरार रखा।
चावल की खेप के बदले रिश्वत का आरोप
हाईकोर्ट को बताया गया कि पंजाब में तैनाती के दौरान, सिकंदरजीत सिंह ने 21 मई, 2021 को सतर्कता ब्यूरो के समक्ष एक शिकायत दर्ज करवाई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता सहित कुछ अधिकारियों ने चावल की खेप स्वीकार कराने में सुविधा प्रदान करने के बदले में रिश्वत की मांग की थी। शिकायत के आधार पर एक जाल बिछाया गया, जिसमें कथित तौर पर 58,000 रुपए की राशि प्राप्त हुई।
हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि याचिकाकर्त्ता से कोई वसूली नहीं की गई, बल्कि यह राशि परमजीत शर्मा नामक एक निजी व्यक्ति से बरामद की गई, जिसके परिणामस्वरूप एफ. आई. आर. दर्ज की गई। इसके बाद याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया गया। बाद में अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया गया था।