Edited By Urmila,Updated: 01 Jun, 2026 01:23 PM

सैंट्रल बोर्ड ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन (सी.बी.एस.ई.) इन दिनों अपनी कक्षा 10वीं और 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल मूल्यांकन (ओ.एस.एम.) को लेकर चौतरफा विवादों और आलोचनाओं से घिर गया है।
लुधियाना (विक्की): सैंट्रल बोर्ड ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन (सी.बी.एस.ई.) इन दिनों अपनी कक्षा 10वीं और 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल मूल्यांकन (ओ.एस.एम.) को लेकर चौतरफा विवादों और आलोचनाओं से घिर गया है।
हाल ही में घोषित हुए नतीजों के बाद जब असंतुष्ट विद्यार्थियों ने पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया के तहत अपनी मूल्यांकित उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन की गई डिजिटल कॉपी डाऊनलोड की तो उनके होश उड़ गए। विद्यार्थियों ने सोशल मीडिया पर उत्तर पुस्तिकाओं में कई गंभीर और अजीबोगरीब तकनीकी खामियों को उजागर किया है। इसके बाद इंटरनैट पर सी.बी.एस.ई. की कार्यप्रणाली को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है और विद्यार्थी बोर्ड से सवाल पूछ रहे हैं कि क्या कॉपियां जांचने के लिए सच में प्रोफैशनल स्कैनर्स का इस्तेमाल किया गया था या सिर्फ किसी मोबाइल एप से फोटो खींचकर काम चला लिया गया।
खुला गड़बड़ियों का पिटारा और विद्यार्थियों का फूटा गुस्सा
अनेक प्रभावित विद्यार्थियों ने 'एक्स' और रेडिट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी आंसर-शीट्स के स्क्रीनशॉट साझा कर गंभीर मुद्दे उठाए हैं। कई उत्तर पुस्तिकाओं के पन्नों पर किसी व्यक्ति के हाथ या मोबाइल फोन की साफ परछाई दिखाई दे रही है जिससे लिखावट पूरी तरह धुंधली हो गई है। विद्यार्थियों का तर्क है कि यदि बोर्ड ने हाई-एंड डिजिटल स्कैनर्स का उपयोग किया होता तो ऐसी परछाइयां आना नाममुकिन था। इसके अलावा कुछ कॉपियों में पन्ने मुड़े हुए दिखाई दे रहे हैं जिसके कारण विद्यार्थियों द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण शब्द और फॉर्मूले छिप गए हैं लेकिन अध्यापकों ने इन मुड़े हुए और कटे हुए हिस्सों पर बिना पढ़े ही 'शून्य' अंक या क्रॉस मार्क लगा दिया है।
हद तो तब हो गई जब अंकों की गणना में भारी भूल का मामला सामने आया। एक विद्यार्थी ने स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए दिखाया कि कैसे एक सही उत्तर पर परीक्षक ने टिक मार्क लगाकर '4 अंक' लिखे थे, लेकिन जब पेज के अंत में कुल योग टोटल किया गया, तो वहां केवल '1 अंक' लिखा गया था।
जल्दबाजी में हुई स्कैनिंग?
सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा कि सी.बी.एस.ई. कॉपियों की इन स्कैन कॉपियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी अध्यापक ने जल्दबाजी में अपने पर्सनल फोन के कैमरे से बिना उचित रोशनी के तस्वीरें खींची हैं। यूजर ने सवाल उठाया कि क्या देश के सबसे बड़े बोर्ड के पास एक अच्छा स्कैनर तक नहीं है। वहीं अभिभावकों का कहना है कि वे प्रति विषय 500 से 700 रुपए की भारी-भरकम फीस देकर अपनी कॉपियों की फोटोकॉपी मंगवाते हैं। इतनी मोटी रकम वसूलने के बाद भी बोर्ड द्वारा ऐसी घटिया और त्रुटिपूर्ण डिजिटल प्रतियां उपलब्ध कराना विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके करियर के साथ खिलवाड़ है। कई मेधावी विद्यार्थियों के मार्क्स इन तकनीकी खामियों के कारण कम हो गए हैं जिससे उन्हें अच्छे कॉलेजों में दाखिला मिलने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
अपने शहर की खबरें Whatsapp पर पढ़ने के लिए Click Here