Edited By Kalash,Updated: 26 May, 2026 05:18 PM

उत्तर भारत में इस बार पड़ रही गर्मी ने एक नया रुझान सामने लाया है।
गुरदासपुर (हरमन): उत्तर भारत में इस बार पड़ रही गर्मी ने एक नया रुझान सामने लाया है। जहां पहले राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र सबसे गर्म माने जाते थे, अब पंजाब और हरियाणा के कई इलाके तापमान के मामले में उनसे भी आगे निकल रहे हैं। मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मानवीय गतिविधियां और बदलता भू-उपयोग भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार, पंजाब के बठिंडा में 45.6 डिग्री सैल्सियस और हरियाणा के सिरसा में 45.8 डिग्री तापमान दर्ज किया गया, जबकि राजस्थान के जयपुर, जोधपुर और जैसलमेर जैसे शहर इससे कम तापमान पर रहे। हैरानी की बात यह रही कि राजस्थान का गर्म माना जाने वाला श्रीगंगानगर भी बठिंडा और सिरसा से ठंडा दर्ज हुआ।
कृषि के तरीकों का असर
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, पंजाब और हरियाणा में लंबे समय से चल रही गेहूं-धान की एक ही फसल प्रणाली ने प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित किया है। गेहूं की कटाई के बाद खाली रह जाने वाले खेत सूरज की गर्मी को तेजी से अपने भीतर सोख लेते हैं, जिससे मई और जून में जमीन का तापमान बढ़ जाता है। इसके अलावा भूजल (जमीन के पानी) की अधिक खपत, घटता वन क्षेत्र (पेड़ों की कमी) और पराली जलाने जैसी गतिविधियां भी गर्मी में बढ़ोतरी का कारण बन रही हैं। धान की तैयारी और बड़े स्तर पर सिंचाई के कारण हवा में नमी बढ़ रही है, जो गर्मी को और अधिक भारी व असहनीय बनाती है।
रातें भी दे रही हैं तपिश
विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब रात के समय भी तापमान में बड़ी गिरावट नहीं आ रही है। इसका एक मुख्य कारण ‘अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव’ है। शहरों में बढ़ रही कंक्रीट की इमारतें, सड़कें और वाहनों की संख्या दिन के दौरान गर्मी को स्टोर (जमा) कर लेती हैं और रात के समय धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिसके कारण ठंडक महसूस नहीं होती। विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान में सूखी हवा के कारण सूरज ढलने के साथ ही तापमान गिरना शुरू हो जाता है, जबकि पंजाब और हरियाणा में नमी और कंक्रीट के कारण गर्मी लंबे समय तक बनी रहती है। इसी वजह से एक जैसा तापमान होने के बावजूद पंजाब की गर्मी ज्यादा तकलीफदेह महसूस होती है।
जंगलों की कमी भी बड़ा कारण
आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब का वन क्षेत्र (फॉरेस्ट कवर) लगभग 3.67 फीसदी और हरियाणा का करीब 3.7 फीसदी है, जो देश में सबसे कम में गिना जाता है। इसके विपरीत, राजस्थान जैसे रेगिस्तानी राज्य का वन क्षेत्र इससे अधिक है। पेड़ों की कमी के कारण प्राकृतिक ठंडक में कमी आ रही है। कृषि और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि यह रुझान जारी रहा, तो कृषि, जल स्रोतों और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। मार्च और अप्रैल में पड़ी अत्यधिक गर्मी के कारण इस साल गेहूं का उत्पादन पहले ही प्रभावित हो चुका है। विशेषज्ञों ने अपील की है कि पेड़ लगाने, जल संरक्षण और बेहतर शहरी नियोजन (अर्बन प्लानिंग) की ओर तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता है, अन्यथा भविष्य में यह क्षेत्र और अधिक भयानक हीटवेव का सामना कर सकते हैं।
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