क्या मजीठिया पर दर्ज हुआ केस कोर्ट में टिक पाएगा?

Edited By Sunita sarangal,Updated: 23 Dec, 2021 11:57 AM

will the case registered against majithia survive in the court

साल 2017 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी द्वारा ड्रग्स व बेअदबी के अहम मुद्दों के बूते पर सरकार बनाई थी, मगर उसके बाद से पूरे पौने पांच साल तक ड्रग्स......

जालंधर(मृदुल): पंजाब के पूर्व मंत्री व शिरोमणि अकाली दल के बड़े नेता बिक्रम सिंह मजीठिया पर ड्रग्स मामले में ब्यूरो ऑफ इन्वैस्टिगेशन द्वारा केस दर्ज करने के मामले में जहां एक ओर सबको चौंका दिया है, वहीं दूसरी ओर कई सियासी चर्चाएं भी गर्मा गई हैं। यह पहली बार नहीं है कि कांग्रेस सरकार ने किसी अकाली नेता पर केस दर्ज किया गया हो। इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी 2002 से 2007 तक मुख्यमंत्री रहते हुए बादल परिवार के खिलाफ भी कई केस दर्ज किए थे, जिसका हर्जाना बाद में कैप्टन को भी भुगतना पड़ा था। इतना ही नहीं जब-जब भी कांग्रेस सरकार द्वारा अकालियों पर केस दर्ज किए गए, तब-तब ही सभी अकाली नेताओं को माननीय अदालतों द्वारा राहत मिलती गई व माननीय हाईकोर्ट तक ने सरकार के केसों व रिपोर्टों को खारिज कर दिया था।

साल 2017 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी द्वारा ड्रग्स व बेअदबी के अहम मुद्दों के बूते पर सरकार बनाई थी, मगर उसके बाद से पूरे पौने पांच साल तक ड्रग्स का मुद्दा ठंडा पड़ गया क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पर अकाली दल के साथ सांठगांठ होने के आरोप लगते रहे। मगर मुख्यमंत्री चन्नी व नवजोत सिंह सिद्धू के सत्ता में आते ही कांग्रेस सरकार द्वारा अचानक मजीठिया पर केस दर्ज करके ड्रग्स के मुद्दे को दोबारा पंजाब में चुनावों का अहम और बड़ा मुद्दा बना दिया है। आगामी चुनावों में अब पंजाब की जनता की नजर इसी मुद्दे पर टिकी रहेगी।

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अकाली दल प्रधान सुखबीर सिंह बादल पहले ही कांग्रेस सरकार पर बदलाखोरी की राजनीति करने के आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने पहले भी आरोप लगाया था कि कांग्रेस सरकार जान बूझकर मजीठिया पर केस दर्ज करेंगी। इससे पहले बेअदबी मामले में बनाई गई एस.आई.टी. के पूर्व मैंबर और पूर्व आई.जी. कुंवर विजय प्रताप सिंह की रिपोर्ट को हाईकोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया था, उसमें पहले प्रकाश सिंह बादल व सुखबीर सिंह बादल को पार्टी बनाया गया था, मगर कोर्ट द्वारा रिपोर्ट खारिज करना कांग्रेस सरकार पर करारा तमाचा साबित हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि माननीय हाईकोर्ट में दाखिल की गई चार्जशीट में जो पुलिस द्वारा आरोप लगाए गए, वह साबित नहीं हो पाए। वहीं इस संबंध में ई.डी. के पूर्व डिप्टी डायरैक्टर निरंजन सिंह का कहना है कि कार्रवाई 9 साल बाद होना कई सवाल खड़े करता है। फिर भी देर आए दरुस्त आए। अब देखना यह होगा कि पुलिस केस में किस एंगल से जांच करती है और कैसे कोर्ट में चार्जशीट फाइल पेश करती है।

क्या हैं सियासी मायने
वहीं मजीठिया पर की गई इस कार्रवाई के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। पहला कांग्रेस सरकार द्वारा ड्रग्स मामले में की गई कार्रवाई सीधा अकाली दल की साख पर हमला है। दूसरा अकाली दल को राजनीतिक नुक्सान पहुंचाने के लिए बदलाखोरी की राजनीति अपनाई गई है। तीसरा सियासी गलियारों में चर्चा है कि कहीं इस कार्रवाई को अगर खानापूर्ति की तरह लिया गया तो हो सकता है कि शिरोमणि अकाली दल लोगों का समर्थन व सहानुभूति मिल जाए।

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किसी अधिकारी ने ली मैडिकल लीव तो किसी ने सख्त तौर पर कार्रवाई करने से किया मना
सूत्रों के मुताबिक सबसे बड़ी बात जो सामने आई है वह पंजाब सरकार द्वारा बेअदबी मामलों में बनाई गई एस.आई.टी. की जांच में बादलों के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत न मिलने के चलते कांग्रेसी नेताओं पर काफी दबाव बन चुका है, जिसके कारण कांग्रेसी नेताओं द्वारा महज बादलों को सियासी तौर पर घेरने के लिए चुनावों से बिल्कुल पहले मजीठिया पर केस दर्ज करके उन्हें राजनीतिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई है। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए पहले डी.जी.पी. सहोता व डी.जी.पी. अस्थाना द्वारा मजीठिया पर कार्रवाई न करने के लिए रातों रात नया डी.जी.पी. लगाया गया। नए डी.जी.पी सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय के आते ही 3 दिन के अंदर मजीठिया पर कार्रवाई हो गई। कई अधिकारियों ने तो इस कार्रवाई से पहले ही मैडीकल लीव ली तो कुछ अधिकारी अकालियों पर सीधे तौर पर कार्रवाई करने के लिए मना कर गए थे।

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अस्थाना के पत्र ने खड़े किए थे कई सवाल
वहीं इस मामले में ब्यूरो ऑफ इन्वैस्टिगेशन के ए.डी.जी.पी. एस.के. अस्थाना द्वारा पंजाब सरकार को ड्रग्स मामले में संबंधी मजीठिया पर केस दर्ज करने के लिए लिखे गए पत्र में कहा गया था कि इस मामले में बिना माननीय हाईकोर्ट की इजाजत के बगैर सीधा केस दर्ज नहीं किया जा सकता क्योंकि इस मामले में पहले ही केस कोर्ट में विचाराधीन है। वहीं सीधे तौर पर केस दर्ज करने के लिए पुख्ता सबूत अधिकारियों के पास नहीं है। पत्र में कार्रवाई के खिलाफ लिखे गए सवालों के मीडिया में लीक होने के बाद से उक्त अधिकारी मैडीकल लीव पर हैं। इस पत्र ने सियासी मायनों को ही बदलकर रख दिया था।

कहीं कांग्रेस पर न पड़ा जाए भारी
वहीं सियासी गलियारों में चर्चा है कि कहीं कांग्रेस सरकार द्वारा मजीठिया पर ड्रग्स मामले में एफ.आइ.आर. दर्ज करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार ली है। क्योंकि सियासी पंडित मान रहे हैं कि कांग्रेस ने ऐसा करके खुद की साख भी खतरे में डाल ली है। इससे पहले भी कांग्रेस सरकार के कार्यकाल दौरान जितने भी केस दर्ज हुए हैं, वह कोर्ट में टिक नहीं पाए हैं। अब देखना यह है कि ब्यूरो ऑफ इन्वैस्टिगेशन द्वारा गठित एस.आई.टी. इस संबंधी कोर्ट में किन सबूतों के तहत चार्जशीट पेश करेगी। कहीं उक्त कार्रवाई से आगामी चुनावों में अकाली दल को लोगों की सहानुभूति मिल गई तो अकाली दल दोबारा सत्ता में आ सकती है।

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