गुलामी की निशानियों को माथे पर लगाकर घूमना नए भारत को स्वीकार नहीं, गुलामी के कलंक मिटाना ही उद्देश्य : तरुण चुग

Edited By Subhash Kapoor,Updated: 12 Aug, 2026 08:27 PM

bjp leader tarun chugh statement

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री एवं राज्य सभा सांसद तरुण चुग ने आज राज्य सभा में “केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026” पर चर्चा में भाग लेते हुए विधेयक का पूर्ण समर्थन किया और सदन से इसे सर्वसम्मति से पारित करने का आग्रह किया।

पंजाब डैस्क :  भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री एवं राज्य सभा सांसद तरुण चुग ने आज राज्य सभा में “केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026” पर चर्चा में भाग लेते हुए विधेयक का पूर्ण समर्थन किया और सदन से इसे सर्वसम्मति से पारित करने का आग्रह किया। चुग ने कहा कि यह केवल एक राज्य के नाम में परिवर्तन का विषय नहीं है, बल्कि आजाद भारत को औपनिवेशिक विरासत और गुलामी की निशानियों से पूरी तरह मुक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि जिन नामों और प्रतीकों को औपनिवेशिक शासन ने भारत पर थोप दिया था, उन्हें स्वतंत्र भारत की पहचान मानकर ढोते रहना उचित नहीं है।

तरुण चुग ने कहा कि जिन लोगों ने हम पर शासन किया, जिन्होंने हमारे देश को गुलाम बनाया और हमारी सभ्यता एवं पहचान को दबाने का प्रयास किया, उनकी दी हुई गुलामी की निशानियों को माथे पर लगाकर घूमना नए आजाद भारत को स्वीकार नहीं है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण का नाम नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ मानसिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है। गुलामी के कलंक को मिटाना और भारत को उसकी अपनी ऐतिहासिक पहचान लौटाना ही इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य होना चाहिए।

चुग ने स्पष्ट किया कि यह इतिहास बदलने का प्रयास नहीं है, बल्कि औपनिवेशिक शासन द्वारा बदली या थोपी गई पहचान से बाहर निकलकर अपनी मूल पहचान को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि आज भारत एक स्वतंत्र और आत्मविश्वासी राष्ट्र है। ऐसे में हमारी संवैधानिक पहचान भी उस भारत की होनी चाहिए जो अपनी सभ्यता, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने इतिहास पर गर्व करता है, न कि उस औपनिवेशिक दौर की छाप को अनिवार्य रूप से ढोता रहे जिसमें भारत को गुलाम बनाया गया था।

विपक्ष के कुछ सांसदों द्वारा यह पूछे जाने पर कि “नाम में क्या रखा है”, तरुण चुग ने कहा कि प्रश्न यह नहीं है कि नाम में क्या रखा है, प्रश्न यह है कि नाम में क्या-क्या रखा है। उन्होंने कहा कि किसी देश और समाज का नाम केवल कुछ अक्षरों का समूह नहीं होता। उसके साथ उसकी ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना और सभ्यतागत पहचान जुड़ी होती है। उन्होंने कहा कि यदि किसी गुलाम देश की पहचान को उसके शासकों ने अपनी सुविधा के अनुसार बदला या प्रचलित किया, तो स्वतंत्रता के बाद उस पहचान की समीक्षा करना गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलने का स्वाभाविक कदम है।

तरुण चुग ने कहा कि भारत ने अंग्रेजी शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता 1947 में प्राप्त कर ली, लेकिन औपनिवेशिक मानसिकता और गुलामी की अनेक निशानियां लंबे समय तक हमारे सार्वजनिक जीवन में बनी रहीं। उन्होंने कहा कि आज का भारत उस मानसिक गुलामी को स्वीकार करने वाला भारत नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश अपनी जड़ों, अपनी भाषाओं, अपनी परंपराओं और अपनी सभ्यतागत विरासत के प्रति नया आत्मविश्वास प्राप्त कर रहा है। इसी क्रम में ऐसे औपनिवेशिक प्रभावों को हटाना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान से जुड़ा विषय है।

चुग ने कहा कि केरल से केरलम की यात्रा इसी व्यापक राष्ट्रीय भावना का हिस्सा है। यह किसी राज्य की पहचान को नया स्वरूप देने से अधिक अपनी मूल पहचान को संवैधानिक रूप से स्वीकार करने की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि ‘केरलम’ नाम जनता की भाषा और सांस्कृतिक स्मृति में लंबे समय से जीवित रहा है। इसलिए यह किसी नई पहचान को थोपने का प्रयास नहीं, बल्कि उस पहचान को संवैधानिक अभिलेख में उसका उचित स्थान देने का प्रयास है।

तरुण चुग ने कहा कि केरल की धरती पूज्य आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि है, जिन्होंने भारत की आध्यात्मिक एकता को मजबूत किया। उन्होंने कहा कि कालडी से निकलकर आदि गुरु शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में भारत की एकात्म चेतना को स्थापित किया। यह वही भारत है जिसकी पहचान किसी औपनिवेशिक शक्ति ने नहीं बनाई, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता ने बनाई है। इसलिए स्वतंत्र भारत का दायित्व है कि वह अपनी पहचान को विदेशी शासन की छाप से नहीं, बल्कि अपनी सभ्यतागत विरासत से परिभाषित करे।

चुग ने कहा कि गुलामी की निशानियां केवल इमारतों, सड़कों या स्थानों के नामों में नहीं होतीं, बल्कि वे हमारी मानसिकता में भी दिखाई देती हैं। यदि स्वतंत्र भारत अपनी ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के स्थान पर औपनिवेशिक काल से चली आ रही पहचान को ही अंतिम सत्य मान लेता है, तो यह राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद मानसिक गुलामी को बनाए रखने जैसा होगा। उन्होंने कहा कि भारत को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा।

विपक्ष के इस आरोप पर कि नाम बदलने से विकास नहीं होगा, तरुण चुग ने कहा कि विकास और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने सदन में केंद्र सरकार द्वारा केरल को दी गई वित्तीय सहायता के आंकड़े रखते हुए कहा कि 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के दौरान केरल को कर हस्तांतरण के रूप में लगभग ₹46,300 करोड़ मिले, जबकि 2014 से 2024 के बीच यह राशि बढ़कर लगभग ₹1.57 लाख करोड़ हो गई। सहायता अनुदान के रूप में भी यूपीए के दशक में ₹25,630 करोड़ की तुलना में मोदी सरकार के कार्यकाल में ₹1,56,214 करोड़ दिए गए, जो 509 प्रतिशत की वृद्धि है।

तरुण चुग ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का विकसित भारत 2047 का संकल्प केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। विकसित भारत का अर्थ ऐसा भारत है जो आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने के साथ-साथ मानसिक रूप से भी स्वतंत्र, सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी और अपनी सभ्यतागत पहचान के प्रति गौरवान्वित हो। उन्होंने कहा कि भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि भारत औपनिवेशिक मानसिकता की अंतिम बची हुई परतों को भी पीछे छोड़े।

चुग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह जी को बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार के कदम भारत को उसकी अपनी पहचान लौटाने और गुलामी की निशानियों से मुक्त करने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत को अब उन प्रतीकों और पहचानों को ढोने की आवश्यकता नहीं है जो उस शासन की देन हैं जिसने भारत को गुलाम बनाया था।

चुग ने कहा कि आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों के चले जाने से नहीं है। आजादी का अर्थ यह भी है कि हम अपनी पहचान स्वयं तय करें, अपने इतिहास को स्वयं सम्मान दें और अपनी सभ्यता को किसी औपनिवेशिक दृष्टि से देखने के लिए बाध्य न हों। उन्होंने कहा कि गुलामी की निशानियों को माथे पर लगाकर घूमना आजाद भारत की नियति नहीं हो सकती। गुलामी के कलंक मिटाना, औपनिवेशिक मानसिकता को पीछे छोड़ना और भारत को उसका आत्मसम्मान लौटाना ही सच्चे अर्थों में स्वतंत्रता का सम्मान है।

तरुण चुग ने सदन के सभी सदस्यों से आग्रह किया कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस ऐतिहासिक प्रयास का समर्थन करें। उन्होंने कहा कि केरल से केरलम केवल एक नाम की यात्रा नहीं, बल्कि गुलामी की मानसिकता से आत्मसम्मान की ओर, औपनिवेशिक विरासत से अपनी सभ्यतागत पहचान की ओर और पराधीनता की स्मृतियों से आत्मविश्वासी भारत की ओर बढ़ने का प्रतीक है।

Related Story

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!