Edited By Subhash Kapoor,Updated: 03 Nov, 2026 08:05 PM

औद्योगिक प्रदूषण, धूल-मिट्टी और पराली जलाने की घटनाओं के बीच बठिंडा की हवा इस कदर जहरीली हो चुकी है कि लोगों के लिए सांस लेना भी मुश्किल होता जा रहा है। मंगलवार को शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) सुबह 9 बजे 1124 के खतरनाक स्तर को पार कर गया।
बठिंडा (विजय वर्मा): औद्योगिक प्रदूषण, धूल-मिट्टी और पराली जलाने की घटनाओं के बीच बठिंडा की हवा इस कदर जहरीली हो चुकी है कि लोगों के लिए सांस लेना भी मुश्किल होता जा रहा है। मंगलवार को शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) सुबह 9 बजे 1124 के खतरनाक स्तर को पार कर गया। दिन के दौरान भी प्रदूषण का स्तर 900 से 1124 के बीच दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई। इस स्थिति ने बठिंडा को देश के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की चर्चा में ला खड़ा किया है।
हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे बेहद बारीक प्रदूषणकारी कणों की भारी मात्रा लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रही है। ये कण सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचकर दमा, सांस संबंधी बीमारियों, आंखों में जलन और हृदय संबंधी परेशानियों का खतरा बढ़ा सकते हैं। सुबह और शाम के समय धुंध तथा धुएं की मोटी परत के कारण शहर का वातावरण और भी खराब हो रहा है।
प्रशासन के दावे अपनी जगह, खेतों में जल रही पराली की हकीकत अलग
एक तरफ जिला प्रशासन और कृषि विभाग की ओर से दावा किया जा रहा है कि जिले में किसानों को पराली न जलाने के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है और गांवों में अधिकारियों की टीमें जाकर किसानों से बातचीत कर रही हैं। किसानों को पराली के प्रबंधन के लिए मशीनों का इस्तेमाल करने की सलाह भी दी जा रही है। लेकिन दूसरी तरफ हवा की बिगड़ती गुणवत्ता और खेतों में सामने आ रही आग की घटनाएं इन प्रयासों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रही हैं।
सवाल यह है कि जब प्रशासनिक अधिकारी गांवों में जाकर किसानों को पराली न जलाने के लिए जागरूक कर रहे हैं तो आखिर खेतों में आग लगाने की घटनाओं पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लग पा रही? जिन इलाकों में पराली जलाई जा रही है, वहां निगरानी और कार्रवाई कितनी प्रभावी है, यह भी जांच का विषय है। केवल जागरूकता बैठकों और कागजी कार्रवाई से प्रदूषण पर काबू पाना संभव नहीं है।
1,612 घटनाएं, 423 FIR, फिर भी खेतों में आग लगाने का सिलसिला जारी
पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार और प्रशासन की ओर से सख्ती के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2 नवंबर 2026 तक की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में पराली जलाने की कुल 1,612 घटनाएं सामने आई हैं। इनमें से 663 स्थानों पर पराली जलाने की पुष्टि हुई है। इन मामलों में 423 FIR दर्ज की गई हैं और करीब 29 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। इसके बावजूद खेतों में आग लगाने का सिलसिला पूरी तरह नहीं रुक पाया है।
बच्चों और बुजुर्गों के लिए बढ़ा खतरा
प्रदूषण के इस गंभीर स्तर का सबसे अधिक असर बच्चों, बुजुर्गों, दमा और सांस की बीमारियों से पीड़ित लोगों पर पड़ सकता है। सुबह सैर करने वाले लोगों, खुले मैदानों में खेलने वाले बच्चों और बाहर काम करने वाले मजदूरों को भी जहरीली हवा का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे हालात में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि लोग अनावश्यक रूप से खुले में निकलने से बचें और प्रदूषण अधिक होने के समय शारीरिक गतिविधियां सीमित रखें।
बड़ा सवाल: जहरीली हवा से शहर को राहत कब मिलेगी?
बठिंडा में प्रदूषण का स्तर लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में जिला प्रशासन, कृषि विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जिम्मेदारी केवल किसानों को जागरूक करने तक सीमित नहीं रह सकती। खेतों में आग लगाने वाले स्थानों की पहचान, वास्तविक समय में निगरानी, जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई और पराली के उचित प्रबंधन के लिए ठोस व्यवस्था जरूरी है। शहरवासियों का सवाल है कि जब पराली जलाने पर FIR और जुर्माने की कार्रवाई हो रही है तो फिर प्रदूषण का स्तर इतना खतरनाक क्यों बना हुआ है? आखिर कब तक बठिंडा के लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर रहेंगे और कब प्रशासन के दावे जमीन पर दिखाई देंगे?