Edited By Kamini,Updated: 18 May, 2026 05:37 PM

केंद्र सरकार के “स्वच्छ भारत अभियान” और सफाई योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद बठिंडा शहर इस समय गंदगी के गंभीर संकट से जूझ रहा है।
बठिंडा (विजय वर्मा): केंद्र सरकार के “स्वच्छ भारत अभियान” और सफाई योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद बठिंडा शहर इस समय गंदगी के गंभीर संकट से जूझ रहा है। एक समय था जब बठिंडा को पंजाब के सबसे साफ शहरों में गिना जाता था, लेकिन आज वही शहर कूड़े के ढेर, ओवरफ्लो सीवर और बदबू मारते गंदे पानी के कारण लोगों के लिए नरक बन चुका है। पिछले 12 दिनों से जारी सफाई कर्मचारियों की हड़ताल ने नगर निगम और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शहर की कोई गली, मोहल्ला या मुख्य सड़क ऐसी नहीं बची जहां कूड़े के ढेर न लगे हों। हालात यह हैं कि घरों के बाहर पड़ा कूड़ा सड़ रहा है, जिससे मक्खियां, मच्छर, कुत्ते, सूअर और अन्य आवारा जानवरों की भरमार हो गई है। गंदगी के कारण डेंगू, वायरल बुखार, दस्त और त्वचा रोग फैलने का खतरा लगातार बढ़ रहा है। डॉक्टरों ने भी चेतावनी दी है कि यदि जल्द हालात काबू में नहीं आए तो शहर में बीमारियों का बड़ा प्रकोप फैल सकता है। हड़ताल में पक्के और कच्चे दोनों तरह के सफाई कर्मचारी शामिल हैं, जो अपनी मांगों को लेकर लगातार आंदोलन पर डटे हुए हैं। उनकी मुख्य मांगों में 597 कच्चे कर्मचारियों को पक्का करना, पुरानी पेंशन योजना बहाल करना और सीवरेज व्यवस्था सुधारने के लिए उचित ठेके जारी करना शामिल है। सफाई कर्मचारियों का कहना है कि वर्षों से वे कम वेतन और अस्थायी नौकरियों के सहारे काम कर रहे हैं, लेकिन सरकार और निगम की ओर से उन्हें केवल आश्वासन ही मिले हैं।

जानकारी के अनुसार बठिंडा के 50 हजार से अधिक घरों और व्यावसायिक संस्थानों से प्रतिदिन 100 टन से ज्यादा कूड़ा निकलता है। शहर के विभिन्न वार्डों से कूड़ा उठाने के लिए टिप्परों और ट्रॉलियों की व्यवस्था की गई थी, लेकिन हड़ताल शुरू होने के बाद यह व्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ी है। न सड़कों पर झाड़ू लग रही है और न ही कूड़ा उठाया जा रहा है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि सीवर ओवरफ्लो होकर गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है। कई इलाकों में लोगों के घरों के बाथरूम तक भर चुके हैं। लोग नहाने-धोने और रोजमर्रा के काम करने तक के लिए परेशान हैं। बदबू के कारण घरों में रहना मुश्किल हो गया है। शहर को “पेरिस” और “दुबई” बनाने के दावे करने वाले नेता भी इस गंभीर मुद्दे पर चुप नजर आ रहे हैं। नगर निगम चुनावों के माहौल में कोई भी नेता खुलकर बयान देने से बच रहा है, क्योंकि उन्हें अपना वोट बैंक खिसकने का डर सता रहा है। दूसरी ओर आम लोग गंदगी और बीमारियों के डर के बीच जीवन बिताने को मजबूर हैं।
लोगों का कहना है कि यदि सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं तो प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी, लेकिन 12 दिन बीत जाने के बावजूद कोई आपात योजना लागू नहीं की गई। इससे साफ है कि नगर निगम और जिला प्रशासन पूरी तरह विफल साबित हुए हैं। इस मामले में नगर निगम कमिश्नर से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। सूत्रों के अनुसार वह चंडीगढ़ में सफाई कर्मचारियों के साथ चल रही बैठकों में व्यस्त हैं। लेकिन शहरवासियों का सवाल साफ है-जब तक बातचीत चलती रहेगी, क्या लोग गंदगी और बीमारियों के बीच ही जीने को मजबूर रहेंगे?
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