‘...कोटला छिपाकी, जिम्मे रात आई-ए’ क्या अापको याद बच्पन का ये खेल

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Friday, December 16, 2016-1:35 PM

अमृतसर : ‘...कोटला छिपाकी, जिम्मे रात आई-ए, जिहड़ा मेरे आगे पीछे देखे उहदी शामत आई ऐ’ ऐसी कई 3-4 दशक पूर्व खेली जाने वाली पंजाब विरसे की खेलें अलोप हो चुकी हैं। ध्यान रहे कि आज से लगभग 3-4 दशक पूर्व, जबकि कम्प्यूटर, फोन, टी.वी., नाममात्र ही थे, पंजाब विरसे की याद दिलाती अनेक खेलेंबच्चों द्वारा खेली जाती थीं। ये ऐसी खेलें होती थीं, जो बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास में वृद्धि करती थीं, लेकिन उन खेलों का समय के साथ अलोप हो जाना पंजाबी विरसे की खेलों के अलोप होने की ओर इशारा करता है।


लड़कियां की पसंद का खेल ‘कोटला छिपाकी’
‘...जिहड़ा मेरे अग्गे पिच्छे देखे’ खेल अधिकतर लड़कियां ही बहुत रूचि के साथ खेलती थीं। इसमें 8 या 10 लड़कियों का ग्रुप बनाया जाता था। सभी लड़कियां अपनी आंखें बंद कर सिर को घुटनों के बीच छिपा लेती थीं और एक लड़की अपनी चुनरी को घुमाकर प्रहार करने वाली चुनरी बना लेती थी और वह लड़की गु्रप के आस-पास चलते हुए यह बोलती जाती थी कि ‘...जिहड़ा मेरे अग्गे-पिच्छे देखे उहदी शामत आई ए’। वह किसी लड़की के पीछे हाथों में पकड़ी घुमावदार चुनरी रख देती थी। यदि उस लड़की को मालूम नहीं पड़ता तो चुनरी रखने वाली लड़की उस लड़की को चुनरी से पीटने लगती थी।

क्या है ‘गुल्ली-डंडा’ खेल?
गुल्ली-डंडा यह खेल स्कूल, स्कूल के बाहर, गली-मोहल्ले और खुले स्थानों पर 8-10 बच्चे मिलकर खेलते थे, जैसे बैट द्वारा बाल को चौका-छक्का लगाया जाता है, वैसे ही डंडे द्वारा गुल्ली पर प्रहार कर गुल्ली को कितनी दूर फैंका जाता था और शेष बच्चे गुल्ली को पकडऩे व डंडे पर निशाना मारने के लिए इधर-उधर दौड़ते थे और जिस बच्चे के हाथ में गुल्ली आ जाती थी, वह डंडे को निशाना लगाता था, ऐसे यह खेल चलती रहती थी।

लड़कियों का खेल है ‘स्टापू’
‘स्टॉपू’ यह खेल अधिकतर लड़कियों द्वारा खेला जाता था, जो 10 या 12 खानों के निशान बनाकर किसी वस्तु को वहां एक खाने में फैंकती थीं और बाद में एक टांग (लंगड़ी टांग) पर एक-एक खाने में से होते हुए वहां पहुंचती थीं। 
स्टॉपू जिस खाने में फैंका होता है, उस तक लंगड़ी टांग से सारा घेरा पार करके पहुंचना होता है। इसी तरह सभी बच्चे बारी-बारी इस खेल को खेलते थे।

छोटे बच्चों का खेल हैं ‘लाटू घुमाना’
लाटू घुमाना खेल भी छोटे-छोटे बच्चे आपस में मिलकर खेलते थे। इस खेल में मिट्टी के बने गोल लाटू के आस-पास पतली डोरी को बराबर रूप से घुमाकर लपेटा जाता था और डोरी के दूसरे किनारे से जब लाटू चलाने के लिए छोड़ा जाता था तो लाटू बड़ी देर तक घूमता रहता था। इस खेल में कुछ बच्चे ऐसे भी होते थे, जो अति तेज गति से चलते लाटू को हथेली में उठाकर भी चलाते थे।

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