Edited By Subhash Kapoor,Updated: 19 Oct, 2026 08:27 PM

दशहरा अथवा विजयदशमी भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे आमतौर पर बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर देश के अधिकांश हिस्सों में लंकापति रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले जलाकर भगवान...
पायल (विनायक): दशहरा अथवा विजयदशमी भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे आमतौर पर बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर देश के अधिकांश हिस्सों में लंकापति रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले जलाकर भगवान श्रीराम की विजय का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन पंजाब के जिला लुधियाना के ऐतिहासिक शहर पायल में दशहरे की एक ऐसी अनूठी परंपरा प्रचलित है, जो इसे देश के अन्य स्थानों से अलग पहचान देती है। यहां प्राचीन श्री राम मंदिर के प्रांगण में स्थापित रावण के स्थायी पुतले को जलाने के बजाय उसकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस परंपरा को दूबे परिवार की ओर से पिछली सात पीढ़ियों से निभाया जा रहा है और हर साल दशहरे के अवसर पर देश-विदेश से परिवार के सदस्य और श्रद्धालु पायल पहुंचते हैं।
पायल के प्राचीन श्री राम मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की पूजा के साथ-साथ रावण के विशाल स्थायी पुतले की भी पूजा की जाती है। मंदिर के प्रांगण में स्थापित यह पुतला लगभग 25 फुट ऊंचा है। स्थानीय परंपरा और पारिवारिक मान्यताओं के अनुसार, यह पुतला मंदिर के इतिहास से जुड़ा हुआ है। मंदिर में लगी शिला पर इसके निर्माण का वर्ष 1835 अंकित होने का उल्लेख किया जाता है। इस प्रकार यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ पायल की प्राचीन विरासत और अनूठी सांस्कृतिक परंपरा का भी प्रतीक बना हुआ है।
संतान प्राप्ति से जुड़ी है पूजा की परंपरा
दूबे परिवार के सदस्य विनोद दूबे और अखिल प्रकाश दूबे ने बताया कि उनके पूर्वज बीरबल दास के घर संतान नहीं थी। इस कारण वह पायल छोड़कर हरिद्वार की ओर चले गए थे। रास्ते में एक साधु ने उन्हें संतान प्राप्ति के लिए पायल लौटकर रामलीला करवाने और दशहरा मनाने की सलाह दी। पारिवारिक मान्यता के अनुसार, उन्होंने पायल आकर रामलीला करवाई और अगले वर्ष दशहरे से पहले उनके घर पहली संतान ने जन्म लिया।
उन्होंने बताया कि इसके बाद परिवार में चार पुत्र पैदा हुए, जिनके नाम हकीम अच्छरूदास दूबे, तुलसीदास दूबे, प्रभुदयाल दूबे और नरायणदास दूबे थे। परिवार इन चारों को भगवान श्रीराम के भाइयों राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न से जोड़कर श्रद्धापूर्वक याद करता है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, इस घटना के बाद दशहरे के अवसर पर राम मंदिर में पूजा-अर्चना करने और रावण के पुतले की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी रुकावट के चली आ रही है।
देश-विदेश से पायल पहुंचते हैं दूबे परिवार के सदस्य
इस अनूठी परंपरा से जुड़े दूबे परिवार के कई सदस्य अब पायल से बाहर रहते हैं। इसके बावजूद वे हर साल दशहरे के अवसर पर अपनी जड़ों और पूर्वजों की विरासत से जुड़े रहने के लिए पायल पहुंचते हैं। पटियाला, बठिंडा, पठानकोट, चंडीगढ़ सहित विभिन्न शहरों और विदेशों में रहने वाले परिवार के सदस्य इस अवसर पर एकत्रित होते हैं। वे मंदिर में पूजा-अर्चना करने के साथ-साथ रामलीला के आयोजन में भी योगदान देते हैं।