Edited By Sunita sarangal,Updated: 13 Aug, 2026 03:34 PM
उन्होंने कहा कि खनिज संसाधन देश की आर्थिक और सामरिक शक्ति के महत्वपूर्ण आधार हैं।
नई दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री एवं राज्यसभा सांसद तरुण चुघ ने आज राज्यसभा में खनन और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा में भाग लेते हुए विधेयक का पूर्ण समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक देश के खनिज क्षेत्र में वित्तीय स्थिरता, निश्चितता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और यह खनिज संसाधनों के विकास को राष्ट्रीय हित, आर्थिक विकास तथा ‘विकसित भारत @2047’ की व्यापक दृष्टि के साथ जोड़ता है।
तरुण चुघ ने कहा कि खनिज पर भारत का चिंतन आज का नहीं है। आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा - “आकरप्रभवः कोशः, कोशाद् दण्डः प्रजायते”, अर्थात् खदानों से राजकोष उत्पन्न होता है और राजकोष से राष्ट्र का सामर्थ्य। ढाई हजार वर्ष पहले भी यह देश जानता था कि जो राष्ट्र भूमि के नीचे की संपदा का सुव्यवस्थित प्रबंधन करता है, वही भूमि के ऊपर सामर्थ्य खड़ा कर पाता है। उन्होंने अथर्ववेद के भूमि सूक्त का उल्लेख करते हुए कहा - “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”, भूमि माता है और हम उसकी संतान हैं; संतानें माता की संपदा पर आपस में झगड़ती नहीं, उसका साझा और संयमित उपयोग करती हैं।
उन्होंने कहा कि खनिज संसाधन देश की आर्थिक और सामरिक शक्ति के महत्वपूर्ण आधार हैं। ये संसाधन कुछ राज्यों में अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं, लेकिन इनका उपयोग पूरे देश के बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आधुनिक प्रौद्योगिकी के विकास में होता है। इसलिए खनिजों के क्षेत्र में ऐसी वित्तीय व्यवस्था आवश्यक है जो स्थिर भी हो, पारदर्शी भी हो और अपेक्षा के अनुरूप पूर्वानुमेय भी हो। यदि अलग-अलग राज्यों में खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर तथा अन्य लेवी की व्यवस्था अत्यधिक असमान और अप्रत्याशित हो जाए, तो इसका सीधा असर खनन की लागत, निवेश, घरेलू उत्पादन और अंततः उद्योग तथा उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
तरुण चुघ ने स्पष्ट किया कि यह विधेयक राज्यों से उनका कर-अधिकार छीनने के लिए नहीं है, बल्कि उस अधिकार को एक राष्ट्रीय अनुशासन देने के लिए है। यह किसी उद्योग को राहत देने के लिए नहीं, बल्कि उस आम नागरिक को बचाने के लिए है जिसके घर, बिजली और सड़क की कीमत खनिज की लागत से तय होती है। उन्होंने कहा कि विधेयक में धारा 9D जोड़कर यह प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर कोई कर, उपकर अथवा अन्य लेवी केवल केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन ही लगा सकेंगी। यह व्यवस्था राज्यों की भूमिका समाप्त करने के लिए नहीं, बल्कि खनिज विकास और कराधान के बीच एक संतुलित, अनुशासित और बेहतर ढांचा स्थापित करने के लिए है, ताकि खनिज क्षेत्र में निवेश और उत्पादन के लिए निश्चितता, स्थिरता और दीर्घकालिक भरोसा कायम हो।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के सशक्त नेतृत्व में पिछले वर्षों में खनिज क्षेत्र में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को संस्थागत रूप दिया गया है। जिस प्रकार GST ने देश की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में एकरूपता और सरलता की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया, उसी भावना के अनुरूप यह विधेयक खनिज क्षेत्र में वित्तीय अनिश्चितताओं और असमानताओं को कम करने का प्रयास करता है। यह विधेयक Ease of Doing Business, ‘Make in India’, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के लक्ष्यों को समर्थन देता है, क्योंकि स्थिर और पूर्वानुमेय लागत संरचना घरेलू उत्पादन तथा डाउनस्ट्रीम विनिर्माण के लिए अधिक अनुकूल वातावरण तैयार करती है।
राज्यसभा सांसद ने खनन-प्रभावित क्षेत्रों के कल्याण की दिशा में District Mineral Foundation के कार्य की ओर सदन का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि वर्ष 2015 के MMDR संशोधनों के माध्यम से DMF की व्यवस्था की गई, जिसका उद्देश्य खनन से प्रभावित व्यक्तियों और क्षेत्रों के हित तथा कल्याण के लिए कार्य करना है। जनवरी 2025 तक उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 23 राज्यों के 645 DMF जिलों में 1,04,251 करोड़ की राशि एकत्र की जा चुकी थी, और PMKKKY के अंतर्गत कम-से-कम 70 प्रतिशत राशि शिक्षा, कौशल विकास तथा आजीविका जैसे उच्च-प्राथमिकता वाले कल्याणकारी क्षेत्रों पर खर्च करने का प्रावधान है। यह इस बात का प्रमाण है कि खनिज संसाधनों से मिलने वाला आर्थिक लाभ केवल उत्पादन और राजस्व तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि खनन-प्रभावित क्षेत्रों के स्थानीय विकास और जनकल्याण से भी जोड़ा गया है।
तरुण चुघ ने कहा कि घरेलू खनिज उत्पादन में भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। लौह अयस्क का उत्पादन वर्ष 2014-15 के 129 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 289 मिलियन टन हो गया। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि पारदर्शी आवंटन, उत्पादन क्षमता में विस्तार और खनिज क्षेत्र में किए गए सुधारों का वास्तविक प्रभाव जमीन पर दिखाई दे रहा है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि खनिज क्षेत्र अब केवल राजस्व का स्रोत नहीं, बल्कि भारत की औद्योगिक क्षमता, बुनियादी ढांचे, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण आधार बन रहा है।
विपक्ष पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि 2004 से 2014 के शासनकाल में प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन की लूट, भाई-भतीजावाद और बंदरबांट को लेकर पारदर्शिता तथा निर्णयों पर गंभीर प्रश्न उठे थे, और कोयला ब्लॉक आवंटन का प्रकरण देश के सामने एक बड़ा उदाहरण रहा। इसके विपरीत वर्तमान सरकार ने प्रतिस्पर्धी नीलामी, पारदर्शिता और नियम-आधारित आवंटन को संस्थागत रूप दिया है। उन्होंने कहा कि आज हमारी नीति का आधार पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही है। यही अंतर है उस व्यवस्था में जहां प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन विवादों का विषय बनता था, और उस व्यवस्था में जहाँ वही संसाधन अब राष्ट्र की आर्थिक तथा रणनीतिक शक्ति का आधार बन रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आने वाला दशक लिथियम, कोबाल्ट, निकल और दुर्लभ मृदा तत्वों का दशक है। इलेक्ट्रिक वाहन, ढांचा निर्माण, सौर ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और रक्षा उत्पादन - इन सबकी नींव महत्वपूर्ण खनिजों पर टिकी है। जो राष्ट्र अपने खनिज की कीमत स्वयं तय नहीं करता, उसकी ऊर्जा और उसकी सुरक्षा - दोनों दूसरों के हाथ में चली जाती हैं। इसलिए यह विधेयक हमें एक साथ दो बातें देता है - व्यवस्था भी और संघवाद भी, राज्य का राजस्व भी और राष्ट्र का विकास भी।
तरुण चुघ ने कहा कि धरती के नीचे जो संपदा है, वह किसी एक सरकार की जागीर नहीं - वह पूरे राष्ट्र की और आने वाली पीढ़ियों की साझी अमानत है। आज यह सदन केवल एक कर-व्यवस्था तय नहीं कर रहा; आज यह सदन यह तय कर रहा है कि भारत की भूमिगत संपदा बिखराव की भेंट चढ़ेगी या राष्ट्र-निर्माण का आधार बनेगी। उन्होंने कहा कि मोदी जी के नेतृत्व में भारत अब निर्णय लेने वाला, सुधार लागू करने वाला और परिणाम देने वाला राष्ट्र बन रहा है। उन्होंने सदन के सभी माननीय सदस्यों से आग्रह किया कि दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करें।
अपने शहर की खबरें Whatsapp पर पढ़ने के लिए Click Here