Edited By Vatika,Updated: 29 Aug, 2026 08:38 AM

मिश्नरेट पुलिस लुधियाना में राजनीतिक सिफारिशें और सियासी दखलअंदाजी शहर
लुधियाना (राज): कमिश्नरेट पुलिस लुधियाना में राजनीतिक सिफारिशें और सियासी दखलअंदाजी शहर की कानून-व्यवस्था पर भारी पड़ती नजर आ रही है। महानगर के कई संवेदनशील और अहम पुलिस थानों में तैनात एसएचओ अपना तय कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं। तैनाती के कुछ ही महीनों बाद अचानक होने वाले तबादलों के चलते थानों की कमान लगातार बदल रही है। जब तक कोई नया थाना प्रभारी अपने इलाके के भूगोल, असामाजिक तत्वों और अपराध के संवेदनशील प्वाइंट्स को समझ पाता है, तब तक राजनीतिक दबाव के चलते उसकी जगह किसी ‘सिफारशी’ एसएचओ की ताजपोशी कर दी जाती है। इस अस्थिरता का सीधा असर शहर में बढ़ते अपराध और लटकती जांचों पर पड़ रहा है।
इलाके की समझ से पहले ही कुर्सी खाली, क्राइम ग्राफ में उछाल :
पुलिस कार्यप्रणाली के जानकारों के अनुसार, किसी भी थानेदार को अपने इलाके के क्रिमिनल नेटवर्क, नशा तस्करों और मुखबिर तंत्र को सक्रिय करने में कम से कम 3 से 6 महीने का समय लगता है। जब तक वह अपना नेटवर्क बनाता है, उससे पहले ही उसका तबादल हो जाता है। जब किसी एसएचओ का 1-2 महीने में ही अचानक तबादला हो जाता है, तो पूर्व में हुई संगीन वारदातों, डकैतियों, मर्डर और स्नैचिंग जैसे मामलों की तफ्तीश अधर में लटक जाती है। नए अधिकारी को सिस्टम समझने में वक्त लगता है, जिसका सीधा फायदा उठाकर इलाके के असामाजिक तत्व और अपराधी बेखौफ होकर नई वारदातों को अंजाम देने लगते हैं।
इन थानों में तेजी से घूमती रही ‘तबादला एक्सप्रेस’
कमिश्नरेट के कई ऐसे प्रमुख थाने हैं जो पिछले कुछ समय से लगातार एसएचओ के फेरबदल को लेकर चर्चा में रहे हैं। इन थानों में कोई भी थाना प्रभारी 1, 2 या 4 महीने से ज्यादा समय तक नहीं टिक सका है। जिनमें प्रमुख थाना हैबोवाल, थाना टिब्बा, थाना डिवीजन नंबर 3, थाना डिवीजन नंबर 4, थाना डिवीजन नंबर 6, थाना सराभा नगर, थाना डाबा, थाना जोधेवाल और अन्य कई महत्वपूर्ण थाने शामिल है।
रसूखदारों को तुरंत नया थाना, अुनभवी सीनियर इंस्पेक्टर पुलिस लाइन बैठे
विभाग के भीतर भी इस दोहरी नीति को लेकर भारी असंतोष देखने को मिल रहा है। जिन इंस्पेक्टरों व सब-इंस्पेक्टरों के सिर पर मजबूत राजनीतिक आकाओं का हाथ है, वे एक थाने से हटते ही तुरंत दूसरे महत्वपूर्ण थाने का चार्ज हासिल कर लेते हैं, भले ही उनके पास फील्ड का पर्याप्त अनुभव हो या न हो। उन्हे सिफारिशों के चलते कम तजुर्बे पर भी मलाईदार थाने मिल जाते है। दूसरी तरफ, जो सीनियर और अनुभवनी अफसर बिना किसी राजनीतिक सिफारिश के मेरिट पर काम करते हैं, उन्हें चंद दिनों में हटाकर पुलिस लाइन का रास्ता दिखा दिया जाता है।
साख बचाने के लिए निश्चित कार्यकाल तय करना जरूरी
महानगर में आए दिन हो रही लूटपाट, स्नैचिंग, फायरिंग और नशा तस्करी की घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए पुलिस के उच्चाधिकारियों को थानों में अफसरों की स्थिरता सुनिश्चित करनी होगी। जब तक थानों में राजनीतिक सिफारिशों के बजाय काबिलियत और निश्चित कार्यकाल के आधार पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कमिश्नरेट पुलिस के लिए शहर की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।