कर्ज माफी के ‘द्वार’ से होकर गुजरेगा सत्ता का रास्ता

Edited By swetha,Updated: 01 Apr, 2019 10:30 AM

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चुनाव चाहे विधानसभा का हो या लोकसभा का सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की चर्चा के केंद्र में किसान आ खड़ा होता है। हकीकत यह है कि देश में विगत में हुए छोटे-बड़े चुनावों का परिणाम यह बताता है कि सत्ता की चाबी उसी दल के हाथ में रही है जिसने किसानों के...

जालंधरःचुनाव चाहे विधानसभा का हो या लोकसभा का सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की चर्चा के केंद्र में किसान आ खड़ा होता है। हकीकत यह है कि देश में विगत में हुए छोटे-बड़े चुनावों का परिणाम यह बताता है कि सत्ता की चाबी उसी दल के हाथ में रही है जिसने किसानों के पक्ष में सबसे ज्यादा आवाज उठाई। किसानों के पक्ष में आवाज उठाने के पीछे कारण बीते 2 दशकों में आर्थिक तंगहाली और कर्ज के बोझ के चलते किसानों की आत्महत्याएं हैं।

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बीते 20 सालों में 3 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के दायर हलफनामे के मुताबिक हर साल 12 हजार से ज्यादा किसान आर्थिक तंगहाली के कारण मौत को गले लगा लेते हैं। किसानों के आज जो हालात हैं उसके लिए किसी एक सरकार को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। पहले पंजाब जैसे राज्य के किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाने से बचते थे लेकिन अब यहां भी इस तरह के कदम उठाए जाने लगे हैं। 1997-2006 के बीच के आंकड़ों पर गौर करें तो देश में करीब 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की है। आत्महत्या का यह मामला देश में उदारीकरण लागू होने के बाद यानी 1991 से बढ़ा है।     

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राजनीतिक हथियार कर्ज माफी 
2014 के बाद मोदी सरकार के कार्यकाल में जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं। हर जगह किसानों को आगे रखने वाली पार्टिंयों ने बाजी मारी है। पंजाब में चुनावी रैलियों में किसानों के मुद्दे  काफी गूंजते रहे हैं। पंजाब के लाखों किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं। किसानी कर्जे की रकम 8 प्रतिशत की दर से बढ़ी लेकिन पैदावार में महज 1.11 प्रतिशत ही वृद्धि हुई है। पंजाब के पास 100 लाख एकड़ जमीन खेती योग्य है, मगर बैंकों ने ऋण की निर्धारित सुविधा से कई गुणा अधिक किसानों को ऋण दे रखा है। पंजाब में 26 लाख किसान हैं। बैंकों ने करीब 40 लाख किसान क्रैडिट कार्ड जारी कर रखे हैं। देश के दूसरे प्रदेश की तरह पंजाब का किसान भी बैंकों के ब्याज के मकडजाल में फंसा हुआ है। इससे किसानों को निकालने के लिए पंजाब सरकार ने काफी प्रयास किए भी हैं लेकिन कर्ज माफी से ही किसानों की मुश्किलें हल होने वाली नहीं हैं। किसानों के मौजूदा हालात के चलते यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि 2019 के चुनाव का विजेता किसानों को साधने वाला पक्ष ही हो सकता है। 

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कर्ज माफी काफी नहीं
किसानों की समस्या के समाधान के लिए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता है। खेती का व्यवसाय न तो लाभप्रद रहा है और न ही आकर्षक इसीलिए युवा पीढ़ी इस व्यवसाय से किनारा कर रही है। अब कृषि का कार्य केवल वही कर रहा है जिसे जीवनयापन का और कोई साधन नहीं मिलता। किसानों की मुश्किलों को हल करने के लिए लंबे समय से लटकती आ रही स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू होने से ही बड़े स्तर पर समस्या का समाधान निकल सकता है।

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किसान विरोधी रही मोदी सरकार : डा. गांधी
पटियाला से सांसद डॉ. धर्मवीर गांधी ने कहा है कि देश के किसान का कभी भी मोदी सरकार ने हाथ नहीं पकड़ा और हमेशा किसान विरोधी रही है। उन्होंने कहा कि स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने के लिए उन्होंने लोकसभा में जोर लगाया लेकिन मोदी सरकार ने लागू नहीं की। इसके अलावा सरकार किसानों को बेहद महंगे कर्जे देती रही, जबकि इंडस्ट्री के 
लिए बड़ी सुविधाएं हैं।

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स्वामीनाथन रिपोर्ट के सुझावों अनुसार हुआ काम : हरसिमरत
एन.डी.ए. सरकार ने किसानों को लाभ देने के लिए अनाज, दालों, तेल बीजों, कॉटन व अन्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में पहले के मुकाबले बड़ी वृद्धि की है। यही कारण है कि कृषि विज्ञानी डा. एम.एस. स्वामीनाथन ने भी हाल ही में लिखे एक आर्टीकल में केंद्र की मोदी सरकार की तारीफ की है। डा. स्वामीनाथन द्वारा अपनी रिपोर्ट में दिए गए कई सुझावों को एन.डी.ए. सरकार द्वारा लागू किया गया है। 

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हर बार हरेक डिबेट में उठाया किसानों का मुद्दा : मान
सांसद भगवंत मान ने कहा कि वह किसानों के मुद्दे पर बेहद गंभीर हैं। संसद में जब भी बोलने का मौका मिला  किसानों का मुद्दा उठाया है। किसानी घाटे का सौदा बन चुकी है। उन्होंने कहा कि किसानों को 100 प्रतिशत खेती पर क्यों रखा जा रहा है? किसानों और उनके बच्चों के लिए रोजगार के मौके पैदा किए जाएं। पंजाब का अन्नदाता किसान खुद भूखा मर रहा है। उनके हरेक संघर्ष का समर्थन किया है।

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भाव स्वामीनाथन रिपोर्ट अनुसार दिए: प्रो. साधु सिंह
सांसद प्रो. साधु सिंह ने कहा कि पंजाब में ‘आप’की सरकार आने के पर राज्य में दिल्ली की तर्ज पर स्वामीनाथन रिपोर्ट की सिफारिशों के तहत खेती फसलों के भाव निर्धारित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कन्वीनर तथा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली सरकार ने पहले ही स्वामीनाथन सिफारिशों के तहत भाव निश्चित कर दिए हैं।

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रोजगार के मौकों पर दिया जाए जोर : उगराहां
भारतीय किसान यूनियन उगराहां के प्रदेशाध्यक्ष जोगिन्द्र सिंह का कहना है कि किसानों की हालत आज बहुत ही नाजुक है। कर्ज माफी के साथ ही ऐसी व्यवस्था भी किए जाने की जरूरत है कि किसानों के सिर कर्ज न चढ़े। खेती लागत को कम किया जाए। खेती योग्य जमीन घट रही है और किसानों मजदूरों के बच्चों में बेरोजगारी भी बढ़ रही है। सरकार को चाहिए कि इंडस्ट्रीज लगाकर रोजगार के मौके पैदा किए जाएं। 

किसानों के पूरे कर्ज माफ किए जाएं: सुखदेव कोकरी
भाकियू के प्रदेश महासचिव सुखदेव सिंह कोकरी कलां ने कहा कि जब तक कर्जा वापस करने से असमर्थ हुए किसानों के पूरे कर्ज माफ नहीं होते तब तक किसानों की आर्थिक हालत में सुधार नहीं हो सकता। किसानों के पूरे कर्ज माफ किए जाने चाहिएं। किसान मर रहा है और राजनीतिक पहुंच वाले अरबों रुपए दबाए बैठे हैं। इसके साथ ही जमीनी हदबंदी कानून लागू होना चाहिए ताकि किसान के पास गुजारे योग्य जमीन हो। 

केंद्र सरकार अपने वायदों पर खरी नहीं उतरी : लक्खोवाल
भाकियू के प्रदेश महासचिव हरिन्द्र सिंह लक्खोवाल ने कहा कि केंद्र सरकार किसानों के साथ किए गए किसी भी वादे पर खरी नहीं उतरी है इसलिए देश के किसानों ने भाजपा को 4 राज्यों में बुरी तरह हराकर अपना गुस्सा जाहिर किया है। उन्होंने कहा कि किसान की डूबती नाव को बचाने के लिए स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करवाने में फेल साबित हुई मोदी सरकार किसान की फसलों के लिए कम से कम समर्थन मूल्य लागू करवाने में भी कारगर साबित नहीं हुई।

किसानों के लिए इंकम गारंटी की व्यवस्था हो : राजेवाल 
भाकियू के राष्ट्रीय प्रधान बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि आर्थिक तौर पर तबाह हो रही किसानी और लगातार घाटे का सौदा साबित हो रही कृषि उद्योग के कारण किसान आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं। केंद्र सरकार का 5 एकड़ तक वाले किसानों को 6 हजार रुपए सालाना मदद देने का जो फैसला है वह एक ड्रामा है। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए इंकम गारंटी की व्यवस्था की जानी चाहिए।

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट एक नजर में

  • स्वामीनाथन कमेटी ने जो सबसे प्रमुख सिफारिश की वह यह थी कि कृषि को राज्यों की सूची की बजाय समवर्ती सूची में लाया जाए, ताकि केंद्र व राज्य सरकारें दोनों किसानों की मदद के लिए आगे आएं और समन्वय बनाया जा सके। 
  • कमेटी ने बीज और फसल की कीमत को लेकर भी सुझाव दिया। कमेटी ने कहा कि किसानों को अच्छी क्वालिटी का बीज कम से कम दाम पर मुहैया कराया जाए और उन्हें फसल की लागत का 50 प्रतिशत ज्यादा दाम मिले। 
  • स्वामीनाथन कमेटी ने कहा कि अच्छी उपज के लिए किसानों के पास नई जानकारी का होना भी जरूरी है। ऐसे में देश के सभी गांवों में किसानों की मदद और जागरूकता के लिए विलेज नॉलेज सैंटर या ज्ञान चौपाल की स्थापना की जाए। इसके अलावा महिला किसानों के लिए किसान क्रैडिट कार्ड की व्यवस्था की जाए। 
  • कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में भूमि सुधारों पर भी जोर दिया और कहा कि अतिरिक्त व बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांट दिया जाए। इसके अलावा कॉर्पोरेट सैक्टर के लिए गैर-कृषि कार्यों को लेकर मुख्य कृषि भूमि और वनों का डायवर्जन न किया जाए। कमेटी ने नैशनल लैंड यूज एडवाइजरी सॢवस का गठन करने को भी कहा। 
  • आंदोलन करने वाले किसान सामाजिक सुरक्षा की भी मांग कर रहे हैं। स्वामीनाथन कमेटी ने भी किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाने की सिफारिश की थी ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके।
  •  कमेटी ने छोटे-मझोले किसानों को लेकर भी बड़ी सिफारिश की थी और कहा था कि सरकार खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था करे, ताकि गरीब और जरूरतमंद किसानों को कोई दिक्कत न हो।  (इनपुट : जालंधर, पटियाला, बठिंडा, संगरूर, मोगा, समराला (सोमनाथ, जोसन, विजय, बेदी, गोपी राऊके, गर्ग)

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