Employees के हक में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- कर्मचारियों को ‘यूज एंड थ्रो’ नहीं बना सकते संस्थान

Edited By Kalash,Updated: 27 May, 2026 04:41 PM

employee high court decision

एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में वर्षों तक ठेके के आधार पर काम लेने और फिर कर्मचारियों को बदल देने के बढ़ रहे रुझान पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पब्लिक इंस्टीट्यूशन कर्मचारियों को 'यूज एंड थ्रो' जैसे इस्तेमाल नहीं कर सकती।

चंडीगढ़ (गंभीर): एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में वर्षों तक ठेके के आधार पर काम लेने और फिर कर्मचारियों को बदल देने के बढ़ रहे रुझान पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पब्लिक इंस्टीट्यूशन कर्मचारियों को 'यूज एंड थ्रो' जैसे इस्तेमाल नहीं कर सकती। किसी संस्था में काम की जरुरत लगातार बनी होती है तो सिर्फ पद का नाम बदल कर एक ठेका कर्मचारी को हटा कर दूसरे कर्मचारी को नहीं लगाया जा सकता। जस्टिस संदीप मोदगिल ने ये अहम फैसला रिंपी नाम की महिला पिटीशनर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।  

पढ़ें क्या है पूरा मामला 

पिटीशनर साल 2021 से सेंट्रल गवर्नमेंट के तहत डेवलपमेंट स्टडीज विभाग में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर काम कर रही थी। उसका सिलेक्शन बकायदा चुनाव कमेटी द्वारा किया गया था। वह 4 दिसंबर, 2021 से लगातार इंस्टीट्यूशन में पढ़ा रही थी, वह 48 परसेंट डिसेबल्ड कैटेगरी से भी संबंधित है। पिटीशनर ने कोर्ट को बताया कि इंस्टीट्यूशन ने साल 2023 में फिर से कॉन्ट्रैक्ट पर असिस्टेंट प्रोफेसर की पोस्ट के लिए एडवर्टाइजमेंट दिया था और उसने उसके लिए भी अप्लाई किया था, लेकिन सिलेक्शन प्रोसेस पूरा होने से पहले ही इंस्टीट्यूशन ने एक और कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉई को अपॉइंट कर दिया और 9 मार्च, 2024 को उसे सेवा मुक्त करने का ऑर्डर जारी कर दिया।

पिटीशनर ने यह भी दलील दी कि उससे रेगुलर टीचर की तरह पूरा एकेडमिक काम लिया जा रहा था, लेकिन उसे हर महीने सिर्फ 52 हजार रुपये की फिक्स्ड सैलरी दी जा रही थी। यह भी कहा गया कि इंस्टीट्यूशन कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉई के साथ शोषण वाला बर्ताव कर रहा है, जबकि इंस्टीट्यूशन ने कोर्ट को बताया कि पिटीशनर को सिर्फ 11 महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर अपॉइंट किया गया था और उसे रेगुलर अपॉइंटमेंट या सर्विस जारी रखने का कोई हक नहीं है।

इंस्टीट्यूशन ने यह भी दावा किया कि उसे नई सिलेक्शन प्रोसेस में सिलेक्ट नहीं किया गया था और नया अपॉइंटमेंट कॉन्ट्रैक्ट पर असिस्टेंट प्रोफेसर की एक अलग पोस्ट पर किया गया था। हाईकोर्ट ने इंस्टीट्यूशन की इन दलीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कोर्ट सिर्फ पोस्ट का नाम नहीं देखता, बल्कि काम का असल नेचर भी देखता है। रिकॉर्ड से यह साफ है कि पिटीशनर पहले भी वही पढ़ाने का काम कर रही थी और बाद में जिस व्यक्ति को अपॉइंट किया गया, उसे भी उन्हीं एजुकेशनल जरूरतों को पूरा करने के लिए अपॉइंट किया गया था। इसलिए यह साफ तौर पर एक कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को हटाकर दूसरे कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को अपॉइंट करने का मामला है। कोर्ट ने यह भी कहा कि एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में लगातार शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर अपॉइंटमेंट न सिर्फ कर्मचारियों के भविष्य को असुरक्षित करते हैं, बल्कि एजुकेशन के माहौल पर भी असर डालते हैं। जब स्टूडेंट्स को पढ़ाने का काम लगातार चल रहा हो, तो इंस्टीट्यूशन टीचर्स को अस्थिरता की स्थिति में नहीं रख सकता। आखिर में हाई कोर्ट ने 9 मार्च, 2024 के रिलीफ ऑर्डर को रद्द कर दिया और पिटीशनर को तुरंत बहाल करने, सर्विस जारी रखने और सभी कॉन्सीक्वेंशियल बेनिफिट्स देने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बकाया सैलरी चार हफ्ते के अंदर 6 परसेंट सालाना ब्याज के साथ दी जाए।

अपने शहर की खबरें Whatsapp पर पढ़ने के लिए Click Here 

Related Story

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!