Edited By VANSH Sharma,Updated: 28 Mar, 2026 08:05 PM
गरीब और मध्यम वर्ग को राहत देने के लिए शुरू की गई आयुष्मान भारत और पंजाब सरकार की 10 लाख रुपये तक की मुफ्त इलाज योजना अब सवालों के घेरे में है।
बठिंडा/चंडीगढ़ (विजय वर्मा): गरीब और मध्यम वर्ग को राहत देने के लिए शुरू की गई आयुष्मान भारत और पंजाब सरकार की 10 लाख रुपये तक की मुफ्त इलाज योजना अब सवालों के घेरे में है। जमीनी हकीकत यह है कि जहां एक तरफ मरीज “मुफ्त इलाज” के भरोसे निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई निजी क्लीनिक और अस्पताल इन योजनाओं को कमाई का बड़ा जरिया बनाते नजर आ रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों और विभिन्न आरटीआई से सामने आए तथ्यों के अनुसार, पंजाब में पिछले कुछ वर्षों में बीमा योजनाओं के तहत हजारों करोड़ रुपये के क्लेम पास हुए हैं। इनमें बड़ी संख्या निजी अस्पतालों से संबंधित है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्लेम की इस तेजी के पीछे मरीजों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ “पैकेज आधारित बिलिंग” और “अनावश्यक टेस्ट” भी बड़ी वजह हैं।
आरटीआई से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, कई जिलों में सामान्य बीमारियों के इलाज के लिए भी महंगे पैकेज लगाए गए। उदाहरण के तौर पर, जहां साधारण बुखार या संक्रमण का इलाज 5 से 10 हजार रुपये में संभव है, वहीं बीमा के तहत 30 से 50 हजार रुपये तक का क्लेम दिखाया गया। कई मामलों में मरीजों को जरूरत से ज्यादा दिनों तक भर्ती रखकर बिल बढ़ाया गया।
सबसे बड़ा खेल जांच और टेस्ट के नाम पर सामने आ रहा है। मरीजों का आरोप है कि उन्हें बिना स्पष्ट कारण के बार-बार ब्लड टेस्ट, सीटी स्कैन और एमआरआई जैसी महंगी जांचें लिखी जाती हैं। कई बार रिपोर्ट “पैकेज” के अनुसार तैयार की जाती है ताकि अधिकतम क्लेम पास हो सके। इससे बीमा कंपनियों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है, जिसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है।
दवाइयों के मामले में भी स्थिति चिंताजनक है। निजी अस्पतालों में कई डॉक्टर अपनी “टाई-अप” कंपनियों की दवाइयां लिखते हैं, जो खुले बाजार में उपलब्ध नहीं होतीं। मरीजों को मजबूरन अस्पताल से ही दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं, जिनकी कीमत बाजार दर से 2 से 5 गुना तक अधिक बताई जाती है। इस तरह दवाइयों के जरिए भी अलग से मुनाफा कमाया जा रहा है।
बीमा योजनाओं में तय “पैकेज सिस्टम” भी अब सवालों के घेरे में है। आरटीआई में सामने आया है कि कई अस्पताल मरीजों को उसी पैकेज में फिट करने की कोशिश करते हैं, जिसमें अधिक भुगतान मिलता हो। छोटे इलाज को भी बड़े पैकेज में डालकर क्लेम बढ़ाया जाता है। इससे इलाज की गुणवत्ता से ज्यादा ध्यान बिलिंग पर केंद्रित हो जाता है।
इसी के साथ एक और बड़ा मुद्दा सामने आया है, डॉक्टरों और निजी अस्पताल संचालकों की बढ़ती संपत्ति। रियल एस्टेट से जुड़े जानकार बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में डॉक्टरों द्वारा जमीन, फ्लैट और कमर्शियल प्रॉपर्टी में निवेश तेजी से बढ़ा है। सोना-चांदी और अन्य संपत्तियों में निवेश भी बढ़ा है, जिससे छोटे शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतों पर असर पड़ा है।
मरीजों की मजबूरी इस पूरे सिस्टम को और मजबूत बना रही है। बीमारी की स्थिति में लोग डॉक्टरों पर सवाल उठाने की स्थिति में नहीं होते। कई मामलों में मरीजों को यह तक जानकारी नहीं होती कि उनके नाम पर कितना बीमा क्लेम किया गया। “मुफ्त इलाज” के बावजूद कई मरीजों से नकद राशि वसूलने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
हालांकि सरकार और स्वास्थ्य विभाग समय-समय पर कार्रवाई का दावा करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी तंत्र कमजोर नजर आता है। फर्जी क्लेम की जांच धीमी है और शिकायतों के समाधान में देरी आम बात है। कुछ अस्पतालों पर कार्रवाई जरूर हुई है, लेकिन इससे व्यापक स्तर पर बदलाव नहीं दिख रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस स्थिति को नहीं सुधारा गया तो स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का असली उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। इसके लिए जरूरी है कि क्लेम की डिजिटल ऑडिटिंग मजबूत की जाए, हर टेस्ट और इलाज की मेडिकल जरूरत की जांच हो और मरीज को उसके इलाज व खर्च की पूरी जानकारी दी जाए। साथ ही, फर्जीवाड़ा करने वाले अस्पतालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और लाइसेंस रद्द करने जैसे कदम उठाने होंगे।
आयुष्मान भारत और पंजाब की मुफ्त स्वास्थ्य बीमा योजना गरीबों के लिए राहत बन सकती थी, लेकिन निगरानी की कमी और निजी अस्पतालों की मनमानी ने इसे कई जगह “मुनाफे का खेल” बना दिया है। अगर समय रहते सख्ती नहीं की गई, तो सरकारी खजाने के साथ-साथ आम जनता का भरोसा भी लगातार टूटता जाएगा।
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