Edited By Kalash,Updated: 27 Jul, 2026 10:50 AM

मेडिकल शिक्षा और ट्रेनिंग को देश के सबसे मुश्किल और तनावपुर्ण पेशों में से एक माना जाता है।
चंडीगढ़ (पाल): मेडिकल शिक्षा और ट्रेनिंग को देश के सबसे मुश्किल और तनावपुर्ण पेशों में से एक माना जाता है। लंबी ड्यूटी, पढ़ाई और काम का लगातार दबाव, मरीजों की जिम्मेदारी, नींद की कमी, निजी जिंदगी में चुनौतियां और भविष्य को लेकर चिंता ट्रेनी डॉक्टरों की मानसिक सेहत पर गंभीर असर डाल रही हैं। इसी बैकग्राउंड में PGI के मनोचिकित्सा विभाग ने ट्रेनी डॉक्टरों में खुदकुशी और खुद को नुकसान पहुंचाने के बढ़ते खतरे को समझने और रोकने के लिए एक विस्तृत रोकथाम ढांचा (प्रिवेंशन फ्रेमवर्क) तैयार किया है। यह रिसर्च प्रोफेसर शुभ मोहन सिंह और निधि यादव द्वारा की गई है। रिसर्च के मुताबिक ट्रेनी डॉक्टरों में सुसाइड या खुद को नुकसान पहुंचाने के पीछे कोई एक वजह नहीं है, बल्कि सामाजिक, पर्सनल और काम के फैक्टर मिलकर इस खतरे को बढ़ाते हैं। एक्सपर्ट्स एक ऐसा फ्रेमवर्क लेकर आए हैं जो मेडिकल इंस्टीट्यूशन्स को समय पर रिस्क फैक्टर्स को पहचानने और असरदार एक्शन लेने में मदद करेगा।
खुदकुशी का बढ़ता बोझ, ट्रेनी डॉक्टर भी प्रभावित
रिसर्च के अनुसार भारत में खुदकुशी एक गंभीर जन-सेहत चुनौती बन चुकी है और मेडिकल विद्यार्थी और ट्रेनी डॉक्टर भी इससे अछूते नहीं हैं। नेशनल मेडिकल कमीशन के आंकड़ों का हवाला देते हुए, रिसर्च में कहा गया है कि पिछले कुछ सालों में कई अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट मेडिकल स्टूडेंट ने खुदकुशी की है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि असली संख्या इससे ज्यादा हो सकती है क्योंकि कई मामले रिपोर्ट ही नहीं होते। रिसर्च के अनुसार, लंबे समय तक ड्यूटी, एग्जाम का प्रेशर, करियर की चिंता, मरीजों की जिम्मेदारी, सीनियर और सहकर्मियों के साथ रिश्तों में तनाव और पर्सनल लाइफ की परेशानियां ट्रेनी डॉक्टरों की मेंटल हेल्थ पर गंभीर असर डालती हैं।
पारिवारिक समस्याओं से लेकर डिप्रेशन और नशे तक कई जोखिम कारक
रिसर्च में खुदकुशी से जुड़े रिस्क फैक्टर को सोशल, पर्सनल और वर्क एनवायरनमेंट की तीन कैटेगरी में बांटा है। सोशल फैक्टर में पैसे की तंगी, परिवार का टूटना, तलाक, परिवार में मानसिक बीमारी, परिवार के किसी सदस्य का पहले खुदकुशी करना या कोशिश, शादीशुदा जिंदगी में झगड़ा और सोशल सपोर्ट की कमी शामिल हैं। पर्सनल वजहों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, दूसरी मानसिक बीमारियां, लंबे समय से चली आ रही शारीरिक बीमारियां, नशे की लत, पर्सनैलिटी डिसऑर्डर, गुस्सा, बिना सोचे-समझे किया गया व्यवहार और पहले खुद को नुकसान पहुंचाने की हिस्ट्री शामिल हैं।
इसके अलावा घातक साधनों तक आसान पहुंच और किसी व्यक्ति के सुसाइडल विचारों से भी रिस्क बढ़ सकता है। काम के माहौल से जुड़े फैक्टर्स में वर्क-लाइफ बैलेंस की कमी, लगातार स्ट्रेस, घर या काम की जगह की समस्याएं, परिवार से दूरी, भेदभाव, विक्टिम बनना और टॉक्सिक काम का माहौल शामिल हैं। रिसर्च से यह भी पता चला है कि सुसाइड से पहले कई चेतावनी के संकेत हो सकते हैं, जैसे लगातार उदासी, व्यवहार में अचानक बदलाव, दूसरों से दूरी बनाना, काम या पढ़ाई में दिलचस्पी न होना, दूसरों को कीमती सामान दे देना और मौत या सुसाइड के बारे में बात करना। ऐसे संकेतों को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अपने शहर की खबरें Whatsapp पर पढ़ने के लिए Click Here