Edited By Vatika,Updated: 14 Oct, 2026 11:17 AM

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने विभाग को बिना सूचना और अनुमति इंग्लैंड जाने और बिना प्राधिकरण
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने विभाग को बिना सूचना और अनुमति इंग्लैंड जाने और बिना प्राधिकरण के ड्यूटी से अनुपस्थित रहने पर चंडीगढ़ पुलिस के एक पूर्व कांस्टेबल की पैंशन संबंधी याचिका को खारिज कर दिया। उक्त व्यक्ति ने 2008 में बर्खास्तगी से पहले की 11 साल और 9 महीने की सेवा के लिए पैंशन की मांग की थी। जस्टिस नमित कुमार की अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता 3 अगस्त, 2007 से जानबूझ कर ड्यूटी से अनुपस्थित रहा। उसने विभाग से भारत से बाहर जाने की छुट्टी लिए बिना और विभाग को यात्रा की सूचना दिए बिना इंग्लैंड चला गया।
6 साल बाद बर्खास्तगी के आदेश के खिलाफ अपील दायर
उस व्यक्ति को 11 अगस्त, 1994 को चंडीगढ़ के सुरक्षा विभाग में कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्हें साल 2007 के दौरान 19 फरवरी से 4 अप्रैल तक 45 दिन की अर्जित छुट्टी दी गई थी, जिसे बाद में 2 अगस्त तक बढ़ा दिया। इसके बाद वह ड्यूटी पर नहीं लौटा और 3 अगस्त से अनुपस्थित रहा। अधिकारियों ने अदालत को बताया कि विभाग को सूचित किए बिना यूनाइटेड किंगडम की यात्रा की और पत्नी ने उसकी अनुपस्थिति को स्वीकार कर लिया था। लगातार अनुपस्थिति के चलते निलंबित कर विभागीय जांच शुरू की गई। बार-बार नोटिस के बावजूद जांच में शामिल नहीं हुए, जिसके परिणामस्वरूप एकतरफा जांच हुई। इसके बाद, 9 जून, 2008 को कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें सेवा से बर्खास्त करने का प्रस्ताव था, लेकिन उन्होंने न जवाब दिया और न ही अनुशासनात्मक प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित हुए। उस व्यक्ति को 2008 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। 6 साल बाद बर्खास्तगी के आदेश के खिलाफ अपील दायर की, जिसे 2015 में अपीलीय प्राधिकरण ने खारिज कर दिया। पुनरीक्षण याचिका भी 2020 में खारिज कर दी गई। इससे व्यथित होकर कांस्टेबल के रूप में कार्यरत रहने के दौरान पेंशन की मांग करते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उस व्यक्ति ने सिर में चोट लगने और स्मृति हानि को भी बचाव के रूप में पेश किया। हालांकि, अधिकारियों ने तर्क दिया कि यह दावा बाद में गढ़ा गया प्रतीत होता है, क्योंकि उसने संबंधित समय पर विभाग को कोई जानकारी या प्रामाणिक चिकित्सा दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवाए थे।
'बर्खास्त कर्मचारी के लिए पैंशन का कोई प्रावधान नहीं'
अधिवक्ता सुखजीत कौर ने तर्क दिया कि उनके मुवक्क्किल ने 11 वर्ष और 9 महीने की नियमित सेवा की है और वे पेंशन के हकदार हैं। यह भी तर्क दिया कि केवल बर्खास्त किए जाने के कारण पैशन से इनकार नहीं किया जा सकता है।अतिरिक्त महाधिवक्ता सिद्धार्थ संधू ने यह तर्क दिया कि नियमों के अंतर्गत बर्खास्त कर्मचारी को पैंशन का कोई प्रावधान नहीं है। वह व्यक्ति उक्त लाभ का हकदार नहीं है।
'गंभीर दुर्व्यवहार' किया गया
अदालत ने पाया कि वह व्यक्ति बिना अनुमति या सूचना के ड्यूटी से अनुपस्थित रहा और यह माना कि ड्यूटी से अनधिकृत अनुपस्थिति, विशेष रूप से ऐसे क र्मचारी द्वारा जो ऐसे पदपर कार्यरत है जहां नियमित उपस्थिति और अनुशासन प्रतिष्ठान के कामकाज के अभिन्न अंग हैं, 'गंभीर दुराचार' है। इसमें कहा गया है कि कोई कर्मचारी अपनी सुविधा के अनुसार इयूटी से अनुपस्थित रहने का अधिकार नहीं जता सकता और उसके बाद अपने द्वारा दी गई सेवा अवधि का हवाला देकर ऐसे आचरण के परिणामों को बेअसर करने की कोशिश नहीं कर सकता।