हिमाचल में बना उत्तर भारत का पहला श्री स्वर्णाकर्षण भैरव मंदिर, दूर-दूर से पहुंच रहे श्रद्धालु

Edited By Subhash Kapoor,Updated: 06 Jul, 2026 11:18 PM

north india s first shri swarnakarshan bhairav  temple built in himachal

हिमाचल प्रदेश में उत्तर भारत के प्रथम श्री स्वर्णाकर्षण भैरव भैरवी जी (सर्वज्ञेश्वर भैरव) मंदिर में मूर्ति स्थापना की गई। इस पुण्य कार्य का सौभाग्य जालंधर से संचालित रुद्र सेना संगठन के चेयरमैन शिवयोगी दयाल को मिला। प्राचीन बाबा डीन्नू नाग जी मंदिर...

कांगड़ा: हिमाचल प्रदेश में उत्तर भारत के प्रथम श्री स्वर्णाकर्षण भैरव भैरवी जी (सर्वज्ञेश्वर भैरव) मंदिर में मूर्ति स्थापना की गई। इस पुण्य कार्य का सौभाग्य जालंधर से संचालित रुद्र सेना संगठन के चेयरमैन शिवयोगी दयाल को मिला। प्राचीन बाबा डीन्नू नाग जी मंदिर तीर्थ क्षेत्र चामंडुा नन्दिकेश्वर, गांव सिहूंड तहसील, नगरोटा बगवां, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में मूर्ति स्थापना और मंदिर निर्माण किया गया। इस दौरान हवन यज्ञ करते हुए सभी परंपराओं का निर्वहन किया गया। दिव्य कार्य स्वर्गीय पंडित बालमुकंद कोरला (गुरु जी) और पुजारी सुभाष शर्मा के आदेश अनुसार संपन्न हुआ। स्वर्णाकर्षण भैरव, भगवान शिव के काल भैरव रुप का अत्यंत सौम्य और सात्विक स्वरूप है। उन्हें सोना आकर्षित करने वाले देवता के स्वरुप में पूजा जाता है। यहां स्वर्णकारों का आना बहुत महत्वपूर्ण है। जिससे स्वर्णकारों पर भैरव जी की विशेष कृपा बनी रहे। इनकी विशेष कृपा यह भक्तों की दरिद्रता दूर कर उन्हें धन, ऐश्वर्य, स्थिरता और कर्ज से मुक्ति प्रदान करते है। 

इस अवसर पर पुजारी पंडित सुभाष, पंडित विपन सोनू जी, पंडित दीक्षित जी, राजकुमार चौधरी,संसार चंद, संजीव कुमार, हिमांशु कुमार, विशाल चौधरी संदीप वर्मा,शिव शर्मा, सुरेश जैर्थ ,शिवाइन जैर्थ, प्रतीश कुमार,आदित्य ठाकुर, महंत राज जी, सूर्य चौधरी आदि ने भी उपस्थिति दर्ज करवाई।  मूर्ति स्थापना के दौरान किक्कर नाथ, महंत हरीश, चेला बाबा व नगरोटा बगवां वासियों का आभार व्यक्त किया गया। स्वर्णाकर्षण भैरव भगवान शिव का एक अत्यंत दिव्य और कल्याणकारी स्वरूप हैं, जो अपने भक्तों को अपार धन-संपदा, सौभाग्य और भौतिक सुख प्रदान करते हैं। इनका रहस्य यह है कि ये केवल धन ही नहीं, बल्कि उस धन के सदुपयोग और जीवन में स्थिरता (बैलेंस) को भी नियंत्रित करते हैं।  भैरव शब्द का अर्थ ही सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार से जुड़ा है। यह काल (समय) और ऊर्जा के नियंत्रक हैं, जो जीवन की घटनाओं और कर्मों को सही दिशा में मोडऩे की अद्भुत क्षमता रखते हैं।  इनकी पूजा से घोर दरिद्रता दूर होती है, कर्जे उतरते हैं और रुके हुए व्यापार में सफलता प्राप्त होती है। वैसे भी ये सात्विक भैरव हैं।  इनकी साधना मुख्य रूप से रविवार और अष्टमी तिथि (विशेषकर कालाष्टमी) पर की जाती है।

श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र के पाठ से खत्म होती है दरिद्रता
नन्दी जी ने मनुष्यों की दरिद्रता नाश करने के लिये महर्षि मार्कण्डेय जी से स्तोत्रका वर्णन किया था और कहा था कि जिनकी कुण्डली में धन भाव का सम्बन्ध क्रूर ग्रहों से है, अनेक अनुष्ठानों के बाद भी धन की परेशानी खत्म नहीं हो रही है तो उसे नित्य 41 दिन तक साधना नियमों के साथ निम्नलिखित पाठ करके 5 माला मंत्र जप करना चाहिए। ऐसा करने से निश्चय ही उत्तम धन लाभ होगा। इस श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र की चर्चा रुद्र यामल तन्त्र में शिव जी ने नन्दी जी से की थी। जब 100 वर्षों तक देवासुर संग्राम में युद्ध के कारण कुबेर जी को जब धन की भारी हानि हुई और उसी समय इस युद्ध से माँ लक्ष्मी जी भी धनहीन हो गई, तब यह दोनों देव भगवान शिव की शरण में गए। भगवान शिव ने नन्दी जी के माध्यम से भगवती के अविनाशी धाम श्री मणिद्वीप के कोषाध्यक्ष श्री स्वर्णाकर्षण भैरव नाथ भगवान की महिमा और उनके वैभव का वर्णन किया और उनकी शरण में जाने को कहा । फिर लक्ष्मी जी और कुबेर जी ने विशालातीर्थ (बद्रीविशाल धाम) में भीषण तप किया तब भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव नाथ जी ने स्वयं प्रगट होकर उन्हें दर्शन दिये तथा चारों भुजाओं से स्वर्ण की वर्षा की जिससे पुन: सभी देवता श्री सम्पन्न हो गए।

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