भाजपा-अकाली गठबंधन पर अंदरखाते चर्चा तेज! सीट बंटवारे से लेकर सीएम चेहरे तक मंथन

Edited By Vatika,Updated: 29 Aug, 2026 02:42 PM

intense behind the scenes discussions on the bjp akali alliance

पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिरोमणि अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन

जालंधर : पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिरोमणि अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर अंदरखाते चर्चाएं तेज होने की खबर है। जहां भाजपा सार्वजनिक तौर पर सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का दावा कर रही है, वहीं दोनों दलों के बीच 70-47 सीट बंटवारे के संभावित फॉर्मूले पर विचार-विमर्श होने की चर्चा है।

सूत्रों के अनुसार, अकाली दल गठबंधन में 70 सीटों के साथ ‘बड़े भाई’ की भूमिका चाहता है, जबकि भाजपा के भीतर एक वर्ग 47 से अधिक और लगभग बराबर हिस्सेदारी की पैरवी कर रहा है। ऐसे में गठबंधन की तस्वीर साफ होने से पहले सीटों का बंटवारा दोनों दलों के बीच सबसे बड़ा पेच बना हुआ है। भाजपा के विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि सितंबर के मध्य तक दोनों राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनने की संभावना है।

सीट बंटवारे पर पहले दौर की बातचीत पूरी
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और अकाली दल नेतृत्व के बीच सीट बंटवारे को लेकर पहले दौर की बैठक हो चुकी है। आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के बीच एक और बैठक होने की संभावना है। बताया जा रहा है कि इस बार बातचीत केवल गठबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि तीन अहम मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है—दोनों दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, कौन-कौन सी सीट किस पार्टी के खाते में जाएगी और चुनाव जीतने की स्थिति में सत्ता की कमान किसके हाथ होगी।

कौन-सी सीट किसे मिलेगी, सबसे बड़ी चुनौती
यदि गठबंधन होता है तो सबसे बड़ा सवाल विधानसभा सीटों के बंटवारे का होगा। पहले भाजपा मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों की सीटों पर चुनाव लड़ती थी, जबकि अकाली दल का प्रभाव ग्रामीण पंजाब में अधिक माना जाता था। लेकिन इस बार भाजपा का दावा है कि उसने ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपना संगठन और जनाधार मजबूत किया है। इसी कारण पार्टी के भीतर यह मांग उठ रही है कि उसे केवल पारंपरिक शहरी सीटों तक सीमित न रखा जाए। ऐसे में दोनों दलों के लिए यह तय करना आसान नहीं होगा कि किस सीट पर किस पार्टी का उम्मीदवार अधिक मजबूत है और किन सीटों पर गठबंधन का वोट आसानी से ट्रांसफर हो सकता है।

मुख्यमंत्री पद पर भी फंस सकता है मामला
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, गठबंधन होने की स्थिति में सबसे संवेदनशील मुद्दा मुख्यमंत्री पद का होगा। सामान्य तौर पर अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी का मुख्यमंत्री पद पर दावा मजबूत माना जाता है। यदि अकाली दल 70 सीटों पर चुनाव लड़ता है तो मुख्यमंत्री पद पर उसका दावा स्वाभाविक रूप से मजबूत होगा। सूत्रों के अनुसार, अकाली दल की ओर से सुखबीर सिंह बादल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने की इच्छा जताई जा रही है। हालांकि भाजपा के भीतर इस बात पर अभी एकमत नहीं है कि चुनाव से पहले किसी एक चेहरे को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना राजनीतिक रूप से लाभदायक होगा या नहीं। इसके साथ ही उपमुख्यमंत्री पद और सरकार में हिस्सेदारी को लेकर भी अंदरखाते चर्चा चल रही है।

वोट ट्रांसफर होगा या नहीं, यही असली परीक्षा
गठबंधन की स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती दोनों दलों के वोट बैंक का एक-दूसरे के पक्ष में ट्रांसफर होना होगा। भाजपा का आधार मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और कुछ खास सामाजिक वर्गों में रहा है, जबकि अकाली दल का प्रभाव ग्रामीण इलाकों और पंथक राजनीति से जुड़े मतदाताओं में माना जाता है। यदि दोनों दल अपने-अपने वोट बैंक को एक-दूसरे के उम्मीदवारों के पक्ष में पूरी तरह ट्रांसफर कराने में सफल रहते हैं तो गठबंधन का गणित मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि वोटों का पूरा ट्रांसफर नहीं हुआ तो कागजों पर दिखने वाला करीब 32 प्रतिशत का संयुक्त वोट शेयर चुनावी मैदान में उतना प्रभावी साबित नहीं होगा।

2024 के वोट गणित ने बढ़ाई गठबंधन की संभावना
सूत्रों के अनुसार, दोनों दलों के बीच बातचीत की सबसे बड़ी वजह चुनावी गणित है। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को पंजाब में 18.56 प्रतिशत वोट मिले थे और पार्टी 23 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल करने में सफल रही थी। वहीं, अकाली दल का वोट शेयर 13.42 प्रतिशत रहा था। दोनों दलों के वोट जोड़ने पर संयुक्त वोट शेयर करीब 32 प्रतिशत बनता है। यही आंकड़ा दोनों दलों के रणनीतिकारों को गठबंधन की संभावनाओं पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित कर रहा है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल वोट प्रतिशत जोड़ने से सीटें नहीं जुड़तीं। सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या दोनों दलों के समर्थक एक-दूसरे के उम्मीदवारों को भी उसी तरह वोट देंगे, जैसे अपनी पार्टी के प्रत्याशी को देते हैं।

'117 सीटों' का दावा या गठबंधन की रणनीति?
भाजपा सार्वजनिक तौर पर सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का दावा कर रही है, लेकिन यदि अंदरखाते चल रही बातचीत किसी समझौते पर पहुंचती है तो यह रणनीति बदल सकती है। फिलहाल तीन सवाल सबसे अहम बने हुए हैं—सीटों का बंटवारा कितना होगा, कौन-सी सीट किस पार्टी को मिलेगी और मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा? इन्हीं सवालों के जवाब तय करेंगे कि पंजाब में भाजपा और अकाली दल एक बार फिर राजनीतिक साझेदार बनेंगे या दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनावी मैदान में उतरेंगी।a

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