मिड-डे मील के नए नियम बने मुसीबत, 3 महीनों से अदायगियां लटकीं, अध्यापकों में रोष

Edited By Kalash,Updated: 06 Sep, 2026 12:55 PM

new mid day meal rules

सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए मिड-डे मील का प्रबंध करने वाले शिक्षकों को एस.एन.ए. स्पर्श पोर्टल के तहत लागू किए गए नए नियमों ने मुश्किलों में डाल दिया है।

गुरदासपुर (हरमन): सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए मिड-डे मील का प्रबंध करने वाले शिक्षकों को एस.एन.ए. स्पर्श पोर्टल के तहत लागू किए गए नए नियमों ने मुश्किलों में डाल दिया है। नई व्यवस्था के तहत बिना जी.एस.टी. नंबर वाले वेंडर को पोर्टल पर ऐड करने में आ रही दिक्कत के कारण विशेष रूप से गांवों के स्कूलों में मिड-डे मील के लिए जरूरी सामान की खरीद और भुगतान का मामला उलझ गया है। अध्यापकों में रोष है कि इन नियमों ने उन्हें अपने मुख्य कार्य पढ़ाने से हटाकर बिलों और भुगतान की प्रक्रियाओं में उलझा दिया है। 

गांवों के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील के लिए आमतौर पर स्थानीय दुकानदारों और छोटे व्यापारियों से किराने का सामान, सब्जियां, दूध, दही, ईंधन आदि खरीदा जाता है। इनमें से अधिकांश छोटे व्यापारी जी.एस.टी. पंजीकृत नहीं हैं। ऐसे में जी.एस.टी. नंबर वाले वैंडर की शर्त ने स्कूलों के लिए दैनिक जरूरतों को पूरा करने में बड़ी व्यावहारिक समस्या खड़ी कर दी है। शिक्षकों का कहना है कि मिड-डे मील की खरीदारी कोई एक बड़ी खरीद नहीं होती, बल्कि दैनिक और साप्ताहिक आवश्यकता के अनुसार कई छोटी-छोटी वस्तुएं एकत्रित करके खाना तैयार किया जाता है। दूध, दही और सब्जियों जैसी चीजों के लिए हर बार जी.एस.टी. वाला बिल हासिल करना गांवों में बेहद मुश्किल है। शिक्षकों का सवाल है कि क्या अब बच्चों के लिए खाने का प्रबंध करने के लिए उन्हें स्थानीय बाजार छोड़कर शहरों में जी.एस.टी. वाले वैंडर ढूंढने जाना पड़ेगा?

इस स्थिति से शिक्षकों की परेशानी के साथ-साथ स्कूलों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने की भी आशंका है। गांव में उचित कीमत पर मिलने वाला सामान यदि दूर शहर से खरीदना पड़ा, तो आवाजाही का खर्च और समय दोनों बढ़ेंगे। शिक्षकों का रोष है कि एक तरफ सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने की बात की जाती है, जबकि दूसरी तरफ उन्हें ऐसे गैर-शिक्षण कार्यों में लगाया जा रहा है। 

इस मामले को और गंभीर बनाने वाला पहलू यह है कि पिछले करीब तीन महीनों से मिड-डे मील से संबंधित कई अदायगियां लटकी हुई हैं। बच्चों का खाना बंद न हो, इसलिए कई शिक्षक अपनी जेब से पैसा खर्च करके व्यवस्था चला रहे हैं। कई शिक्षकों द्वारा अपने स्तर पर 30 से 50 हजार रुपए तक खर्च किए जाने की स्थिति बनी हुई है। इस कारण शिक्षकों में इस बात को लेकर भी रोष है कि सरकारी व्यवस्था का खर्च अपनी निजी आय में से उठाने के लिए उन्हें मजबूर होना पड़ रहा है। पहले मिड-डे मील से संबंधित खरीदारी का भुगतान पी.एफ.एम.एस.के. माध्यम से सीधे वैंडर के खाते में करने की व्यवस्था थी। अब बिल पहले बी.पी.ओ. दफ्तर में जमा करवाने पड़ते हैं और इसके बाद भुगतान की प्रक्रिया खजाना दफ्तर तक पहुंचती है।

शिक्षकों का कहना है कि इस बहु-स्तरीय प्रक्रिया से सीधे भुगतान के बजाय कागजी कार्रवाई बढ़ गई है, जिसका सीधा असर अदायगी में देरी के रूप में सामने आ रहा है। एलीमैंट्री टीचर यूनियन के जिला अध्यक्ष अश्वनी फज्जूपुर ने इस मामले पर रोष व्यक्त करते हुए कहा कि गांवों की जमीनी हकीकत को ध्यान में रखे बिना बनाए गए नियम शिक्षकों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मिड-डे मील की व्यवस्था को सरल बनाने की जरूरत है और गैर-जी.एस.टी. वैंडरों से जरूरी सामान खरीदने व उनके भुगतान के लिए कोई व्यावहारिक विकल्प दिया जाना चाहिए।

शिक्षक नेता ने कहा कि यदि हर छोटी-बड़ी वस्तु के लिए जीएसटी बिल अनिवार्य किया जाता है, तो गांव स्तर पर इसे अमल में लाना बेहद मुश्किल होगा। उन्होंने मांग की कि पिछले समय की लंबित अदायगियां तुरंत जारी की जाएं और नए नियमों को जमीनी परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाए। बच्चों के मिड-डे मील जैसी बुनियादी व्यवस्था में नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन नियम ऐसे भी होने चाहिए जिन्हें गांवों के स्कूलों में व्यावहारिक रूप से लागू किया जा सके। शिक्षकों का रोष है कि मिड-डे मील से संबंधित बिलों के नए नियमों ने उन्हें पढ़ाने के बजाय बिलों और वैंडरों के चक्करों में डाल दिया है।

शिक्षक वर्ग ने सरकार और संबंधित विभाग से मांग की है कि वर्तमान व्यवस्था की तुरंत समीक्षा करके गैर-जी.एस.टी. वैंडरों के लिए व्यावहारिक भुगतान व्यवस्था की जाए, लंबित अदायगियां जारी की जाएं और शिक्षकों को गैर-शिक्षण कार्यों के अतिरिक्त बोझ से राहत दी जाए,, ताकि वे अपना मुख्य ध्यान बच्चों को शिक्षा देने पर केंद्रित कर सकें।

अपने शहर की खबरें Whatsapp पर पढ़ने के लिए Click Here


 

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!