शारीरिक व मानसिक बीमारियों की चपेट में आ रहे मासूम, माता-पिता रहें Alert

Edited By Kalash,Updated: 03 Feb, 2026 11:43 AM

children physical and mental illnesses

बच्चों की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक पहचान को खत्म कर रहा है।

अमृतसर (सर्बजीत): बच्चों में दिन-प्रतिदिन 'डिजिटल नशा' बढ़ रहा। खेल मैदान छोड़ मोबाइल स्क्रीन में कैद बचपन होता जा रहा है। बता दें कि आज के दौर में जहां मोबाइल फोन जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है वहीं यह बच्चों के लिए एक 'घातक हथियार' साबित होता जा रहा है। वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए ताज़ा सर्वेक्षणों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक पहचान को खत्म कर रहा है।

डॉक्टरों के अनुसार जो बच्चे दिन में 4 से 5 घंटे मोबाइल स्क्रीन पर गेम खेलने या वीडियो देखने में बिताते हैं, उनमें चिड़चिड़ापन, एकाग्रता की कमी और नींद न आने जैसी गंभीर समस्याएं देखी जा रही हैं। मोबाइल गैम्स और सोशल मीडिया की लत के कारण बच्चे वास्तविक दुनिया से कटकर एक काल्पनिक दुनिया में जीने लगे हैं। इसके परिणामस्वरूप उनमें अकेलेपन की भावना बढ़ रही है, जो आगे चलकर डिप्रेशन का रूप ले सकती है।

शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से भी कमजोर हो रहे बच्चे

मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडिएशन बच्चों की नाज़ुक आंखों और मस्तिष्क के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रही है। लगातार मोबाइल उपयोग के कारण बच्चों की दृष्टि कमजोर हो रही है व गर्दन और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं भी कम उम्र में ही सामने आने लगी हैं। खेल के मैदानों से दूरी बनाने के कारण मोटापा भी एक बड़ी समस्या के रूप में उभर रहा है।

माता-पिता की लापरवाही

आजकल माता-पिता अपनी व्यस्त दिनचर्या के कारण बच्चों को चुप रखने के लिए मोबाइल थमा देते हैं। माता-पिता की यह लापरवाही बच्चों को गलत सामग्री व साइबर क्राइम के जाल में फंसा सकती है।

सामाजिक दूरी और पढ़ाई पर गहरा असर

इस संबंध में स्कूल के डायरैक्टर मुकेश पुरी ने बताया कि डिजिटल युग में मोबाइल के कारण बच्चों की सीखने की क्षमता कम हो रही है। वे किताबों से दूर होकर केवल वीडियो पर निर्भर होते जा रहे हैं। स्कूलों में शिक्षकों ने भी नोटिस किया है कि मोबाइल का अधिक उपयोग करने वाले बच्चे पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं और उनकी सोचने-समझने की शक्ति सीमित होती जा रही है।

सुरक्षा के निर्देश और समाधान

जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग द्वारा समय-समय पर ऐसे आदेश व गाइडलाइन जारी की जाती है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखा जाए। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर निगरानी रखें और स्वयं एक पहेदार की भूमिका निभाएं।

‘डिजीटल भेंगापन’ बन रही है गंभीर समस्या

डिजीटल युग में मोबाइल फोन बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग गंभीर शारीरिक नुक्सान का कारण बन रहा है। नेत्र विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि घंटों तक मोबाइल स्क्रीन को नज़दीक से देखने के कारण बच्चों की आंखें टेढ़ी हो रही हैं, जिसे चिकित्सकीय भाषा में ‘डिजिटल स्ट्रैबिस्मस’ (भेंगापन) कहा जाता है।

डॉक्टरों के अनुसार जब बच्चा लगातार मोबाइल की छोटी स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित करता है तो उसकी आंखों की मांसपेशियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। लंबे समय तक आंखों को एक स्थिति में केंद्रित रखने से आंखों की पुतलियां अंदर की ओर झुकने लगती हैं। माता-पिता की मामूली लापरवाही से शुरू हुई यह आदत धीरे-धीरे पक्का भेंगापन बन सकती है। विशेषज्ञों ने पाया है कि 5 से 12 वर्ष की आयु के बच्चे इस समस्या की चपेट में सबसे अधिक आ रहे हैं।

लक्षण और गंभीर परेशानियां

यदि आपका बच्चा बार-बार आंखें मलता है, किसी चीज़ को देखने के लिए सिर टेढ़ा करता है या उसे धुंधला दिखाई देता है तो यह गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। मोबाइल के कारण आंखों में सूखापन की समस्या भी तेज़ी से बढ़ रही है।

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