Edited By Kalash,Updated: 13 May, 2026 12:19 PM

गत रात्रि नगर कौंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष नरेंद्र गर्ग 'नीटा' और भाजपा प्रत्याशी ममता गर्ग पर हुए जानलेवा हमले ने शहर में सनसनी फैला दी है।
बरनाला (विवेक सिंधवानी, रवि): गत रात्रि नगर कौंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष नरेंद्र गर्ग 'नीटा' और भाजपा प्रत्याशी ममता गर्ग पर हुए जानलेवा हमले ने शहर में सनसनी फैला दी है। इस घटना ने न केवल अपराधियों के बुलंद हौसलों को उजागर किया है, बल्कि एक गंभीर संवैधानिक और सुरक्षा संबंधी बहस को भी जन्म दे दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या चुनाव आचार संहिता (कोड ऑफ कंडक्ट) के नाम पर जनता से उनकी सुरक्षा का अधिकार छीना जा रहा है?
बहादुरी ने बचाई जान, पर आगे क्या?
बीती रात जब तीन हथियारबंद लुटेरों ने नीटा गर्ग के परिवार को घेरा, तो उन्होंने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर से हवाई फायर कर अपनी और अपनी पत्नी की जान बचाई। यदि उस समय उनके पास लाइसेंसी हथियार न होता, तो लुटेरे किसी भी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते थे। अब यक्ष प्रश्न यह है कि आगामी नगर निगम चुनावों के मद्देनजर प्रशासन द्वारा हथियार जमा कराने के निर्देश जारी किए जाएंगे। ऐसे में, जब लुटेरे सरेआम अवैध हथियारों के साथ सड़कों पर घूम रहे हैं, तब कानून का पालन करने वाला आम नागरिक अपनी सुरक्षा कैसे करेगा?
आचार संहिता और सुरक्षा की दोहरी चुनौती
नगर निगम चुनावों को लेकर कोड ऑफ कंडक्ट लागू हो चुका है। नियमानुसार, शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराने के लिए पुलिस प्रशासन लाइसेंसी हथियार सरेंडर करने का दबाव बनाता है। लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए जनता के मन में कई सवाल हैं: अवैध हथियारों पर लगाम क्यों नहीं? अपराधी बिना किसी डर के तेजधार हथियारों और बिना नंबरी मोटरसाइकिल पर घूम रहे हैं, जबकि पुलिस की सख्ती केवल लाइसेंसी हथियार धारकों पर ही क्यों? सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? यदि हथियार जमा कराने के बाद किसी नागरिक के साथ अनहोनी होती है, तो क्या प्रशासन इसकी जिम्मेदारी लेगा?
लाइसेंस का औचित्य: यदि संकट के समय नागरिक अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर से आत्मरक्षा ही न कर पाए, तो भारी भरकम फीस भरकर लाइसेंस लेने का क्या फायदा?
पुलिस का पक्ष और जनता का डर
एक ओर जिला पुलिस प्रमुख मोहम्मद सरफराज आलम ने आश्वासन दिया है कि अपराधियों को जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा है कि पुलिस की सख्ती जनता की भलाई के लिए है। लेकिन दूसरी ओर, जमीनी हकीकत यह है कि लुटेरे पुलिस की नाकेबंदी से बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। नीटा गर्ग पर हुए हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अपराधी यह नहीं देखते कि सामने वाला व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का प्रत्याशी है या आम नागरिक। वे केवल अवसर की तलाश में रहते हैं। ऐसे में आचार संहिता के दौरान आत्मरक्षा के अधिकार को सीमित करना लोगों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
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