आजादी के बाद भी खुद को गुलाम समझते हैं 7 गांवों के लोग, पूरे भारत से संपर्क टूटने के बाद छलका दर्द

Edited By Sunita sarangal,Updated: 29 Jun, 2026 02:59 PM

7 villages of gurdaspur cut off during monsoon

आपको बता दें कि हर साल 15 जून के आस-पास टेम्पररी पुल हटाकर यहां फेरी लगा दी जाती थी, लेकिन इस बार बेमौसम बारिश के बावजूद टेम्पररी तौर पर बनाया गया प्लाटून पुल नहीं हटाया गया।

गुरदासपुर(हरजिंदर गोराया): रावी नदी के उस पार और पाकिस्तान की सीमा से लगे 7 गांवों के लोगों की ज़िंदगी बारिश के दिनों में बहुत मुश्किल हो जाती है क्योंकि नदी के उस पार के सातों गांवों का बाकी भारत से संपर्क टूट जाता है। तूर, भरयाल, मम्मिया, चिब, चकरंगा, लसिआण, कजले और चुंबर के लोगों को न तो कोई मेडिकल सुविधा मिलती है, न ही इन गांवों के युवा स्कूल या कॉलेज जा पाते हैं। जो लोग रोज़ाना नौकरी या काम के लिए नदी पार करते हैं, वे भी अपने काम पर नहीं पहुंच पाते।

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आपको बता दें कि हर साल 15 जून के आस-पास टेम्पररी पुल हटाकर यहां फेरी लगा दी जाती थी, लेकिन इस बार बेमौसम बारिश के बावजूद टेम्पररी तौर पर बनाया गया प्लाटून पुल नहीं हटाया गया। कल रात हुई बारिश के बाद रावी में पानी का लेवल अचानक बढ़ गया और टेम्पररी प्लाटून ब्रिज का अगला हिस्सा पानी में बह गया, जिससे उस पार के सात गांवों के लोगों की ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो गई है। हालांकि, आज पानी का लेवल कम होने की वजह से फेरी चल रही है और इन गांवों में जाने का एकमात्र तरीका नाव है। आज़ादी के बाद रावी नदी के उस पार 14 गांव बसे थे, लेकिन आज़ादी के 79 साल बीत जाने के बावजूद किसी भी सरकार ने इन गांवों की सुध नहीं ली, जिसकी वजह से बहुत से लोग इन गांवों को छोड़कर चले गए हैं। अभी 14 में से सिर्फ़ 7 गांव ही रावी नदी के उस पार रह गए हैं। रावी नदी पर पक्का पुल न होने की वजह से इन लोगों को भी बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। देश की आज़ादी के 79 साल बीत जाने के बावजूद ये लोग बारिश के मौसम में देश के बाकी हिस्सों से कट जाते हैं।

रावी नदी के उस पार रहने वाले गांवों के लोगों ने बताया कि भारत-पाक बॉर्डर पर बसे करीब एक दर्जन गांवों के लोग कहने को तो भारत का हिस्सा हैं, लेकिन बारिश के मौसम में इन गांवों के लोग खुद को बेबस महसूस करते हैं। आजादी के इतने साल बाद भी पुल के उस पार रहने वाले 7 गांवों के लोग खुद को गुलाम समझते हैं, क्योंकि जब भी यह टेम्परेरी पुल उठाया जाता है, तो उनका देश से संपर्क टूट जाता है। कई लोगों का कहना है कि इन दिनों में उन्हें पता ही नहीं चलता कि वे किस देश के नागरिक हैं, क्योंकि यह इलाका दो नदियों के पार और LoC के करीब है। बारिश के मौसम में नहर विभाग का बनाया प्लाटून पुल उठा दिया जाता है और लोगों को आने-जाने के लिए एक ही नाव का सहारा लेना पड़ता है। जो कभी-कभी नदी में पानी का लेवल ज़्यादा होने की वजह से चलने लायक नहीं रहती और उस पार के 7 गांव टापू बन जाते हैं और फिर लोगों के आने-जाने का कोई साधन नहीं बचता। 2018 में केंद्र सरकार ने यहां एक पक्का पुल बनाने की मंजूरी दी थी, लेकिन पता नहीं क्यों पुल का काम शुरू नहीं हुआ। गांवों के लोगों ने पिछले साल चुनाव का बहिष्कार करने की घोषणा की थी और इस बार भी उन्होंने बड़ा संघर्ष करने का मन बना लिया है।

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