Edited By Urmila,Updated: 14 Oct, 2026 01:16 PM

बॉक्सिंग रिंग में अपने विरोधियों के मुक्कों का बहादुरी से सामना करने वाले और ड्रग डीलरों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाले परविंदर सिंह झोटे आखिरकार गोलियों से ज़िंदगी की जंग हार गए।
मानसा (संदीप मित्तल): बॉक्सिंग रिंग में अपने विरोधियों के मुक्कों का बहादुरी से सामना करने वाले और ड्रग डीलरों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाले परविंदर सिंह झोटे आखिरकार गोलियों से ज़िंदगी की जंग हार गए। ड्रग्स के खिलाफ अपनी लड़ाई की वजह से पूरे पंजाब में मशहूर हुए झोटे की ज़िंदगी का एक अनदेखा पहलू उनका शानदार स्पोर्ट्स सफर था। वह सिर्फ ड्रग्स के खिलाफ आवाज उठाने वाले नौजवान ही नहीं थे, बल्कि नेशनल लेवल के मेडल जीतने वाले बॉक्सर और पढ़ाई में भी होशियार स्टूडेंट थे। उनके बॉक्सिंग कोच रामनाथ धीरा के मुताबिक, परविंदर पढ़ाई और स्पोर्ट्स दोनों में ही बेहद होशियार और मेहनती थे।
उन्होंने मानसा के खालसा हाई स्कूल में बॉक्सिंग की ट्रेनिंग लेना जारी रखा। उन्होंने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर के कॉम्पिटिशन में गोल्ड और ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी बॉक्सिंग कॉम्पिटिशन में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। मानसा के स्पोर्ट्स ग्राउंड से नेशनल लेवल तक पहुंचना उनकी कड़ी मेहनत और पक्के इरादे की मिसाल थी। मेडिकल सब्जेक्ट्स के साथ बारहवीं करने के बाद उन्होंने B.Sc. में एडमिशन लिया, लेकिन बॉक्सिंग के शौक ने उन्हें जालंधर के लायलपुर खालसा कॉलेज में एडमिशन दिलाया, जहाँ उन्होंने B.A. की पढ़ाई जारी रखी। झोटा, जिन्हें क्रिकेट का भी शौक था, ने इस खेल में अच्छे नतीजे हासिल किए थे। वह अक्सर खालसा स्कूल के क्रिकेट ग्राउंड में जाते थे और युवा खिलाड़ियों की हिम्मत बढ़ाते थे।
वह खुद भी ड्रग्स में फंसे थे
परविंदर की ज़िंदगी सिर्फ़ जीत की कहानी नहीं थी। उनकी ज़िंदगी के बारे में आम बातों के मुताबिक, एक समय ऐसा भी आया जब वह खुद ड्रग्स के दलदल में फंस गए थे। ज़िंदगी में मुश्किल दौर से गुज़रते हुए उन्होंने गुरबानी का सहारा लिया, गुरु से जुड़े और ड्रग्स से दूर रहे। फिर उन्होंने दूसरों के बेटों को उसी ड्रग्स से बचाने की मुहिम शुरू की जिसने कभी उनकी ज़िंदगी पर असर डाला था। उन्होंने कथित ड्रग्स की बिक्री के केस उठाने शुरू किए और ड्रग्स की तस्करी के खिलाफ़ आवाज़ उठाकर चर्चा में आए।
उनके काम करने का तरीका विवादों में रहा लेकिन ड्रग्स के खिलाफ़ उनकी एक्टिविटीज़ जारी रहीं। अब, कथित तौर पर एक मेडिकल स्टोर के मालिक की चलाई गोलियों ने उनकी जान ले ली। आरोपियों के खिलाफ पहले भी क्रिमिनल केस दर्ज होने की खबरें हैं। परविंदर की मौत ने उनके स्पोर्ट्स करियर से जुड़ी यादें भी ताजा कर दी हैं। खालसा स्कूल का वह ग्राउंड, जहां वह कभी बॉक्सिंग की प्रैक्टिस करते थे और बाद में युवाओं को खेलने के लिए प्रोत्साहित करते थे, अब उनकी यादों से जुड़ा है। कोच रामनाथ धीरा की यादों में वह एक ऐसे स्टूडेंट के रूप में जिंदा रहेंगे, जिन्होंने पढ़ाई और स्पोर्ट्स में कड़ी मेहनत की।
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