पर्यावरण स्वच्छता को बस्तियों और झुग्गियों का भी करना होगा पुनर्वास

Edited By Suraj Thakur,Updated: 24 Jul, 2019 11:40 AM

slum areas

एक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के 143 नगरों की 73 बस्तियों और झुग्गियों में बस रहे 14 प्रतिशत लोग जहां बदतर जिंदगी जी रहे हैं, वहीं उनकी दिनचर्या से पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। सरकार ने समय रहते यदि इस वर्ग के लोगों का पुनर्वास नहीं किया तो...

जालंधर(सूरज ठाकुर): एक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के 143 नगरों की 73 बस्तियों और झुग्गियों में बस रहे 14 प्रतिशत लोग जहां बदतर जिंदगी जी रहे हैं, वहीं उनकी दिनचर्या से पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। सरकार ने समय रहते यदि इस वर्ग के लोगों का पुनर्वास नहीं किया तो इनकी संख्या में इजाफा होगा और प्रदूषण की समस्या भी बढ़ेगी। 

धीमी है पुनर्वास की रफ्तार 
डाऊन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने साल 2015-16 में स्मार्ट सिटी योजना शुरू की थी। इसके 4 साल बीतने के बावजूद लोगों को आवास और सुविधाएं मुहैया करवाने की गति बहुत ही धीमी है। पूरे देश की 2,613 नगरों में झुग्गी बस्तियों की बात की जाए तो स्मार्ट सिटी योजना के तहत 4 साल बाद भी आबंटित फंड का केवल 21 प्रतिशत ही खर्च किया गया है। 

बढ़ेगी प्रदूषण की समस्या 
2050 तक शहरी आबादी 1.66 करोड़ होने का अनुमान है। गांव से शहरों में आने वाले कामगारों का बोझ मुख्य रूप से झुग्गी बस्तियों पर ही पड़ता है। ऐसे में यदि इन कामगारों की झुग्गियों और बस्तियों को सुविधाओं के साथ स्थायी आवास में न बदला तो शहरों के सामने प्रदूषण की समस्या तो बढ़ेगी ही, साथ में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में शहरों में रहना भी मुश्किल हो जाएगा। अभी हर 6 में से एक भारतीय शहरों में स्थित झुग्गी बस्ती में रहता है। झुग्गी बस्तियां इतनी सामान्य हो चुकी हैं कि 65 प्रतिशत भारतीय नगरों में इनकी मौजूदगी है। 

10 में से 4 को नहीं मिलता स्वच्छ जल 

रिपोर्ट के मुताबिक 10 में से 6 झुग्गीवासी नालों के पास रहते हैं और 10 में से 4 को स्वच्छ जल ही नहीं मिलता। झुग्गियों और बस्तियों में निकास नालियों की समस्या रहती है। नहाने के बाद पानी सीधा या तो नालों में जाता है या फिर बस्तियों में ही जमा रहता है। नालों में कचरा भी भूक्षरण और प्रदूषण का कारण बनता है। झुग्गियों और बस्तियों में रहने वाले कामगार अभी शहरी क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद में करीब 62 प्रतिशत योगदान दे रहे हैं, एक अनुमान के मुताबिक 2030 तक यह बढ़कर 75 प्रतिशत हो जाएगा। 

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