हाल-ए-सिविल अस्पताल कमीशनखोरी के चक्कर में नवजात बच्चों को एक प्राइवेट अस्पताल में किया जा रहा रैफर

Edited By Sunita sarangal,Updated: 19 Nov, 2019 05:50 PM

civil hospital jalandhar

सरकार द्वारा सिविल अस्पताल में करोड़ों खर्च कर जच्चा-बच्चा अस्पताल बनाया गया है, जहां गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी व बाद में बीमार नवजात बच्चों के लिए स्पैशल वार्ड तैयार किया गया है

जालंधर(शौरी): सरकार द्वारा सिविल अस्पताल में करोड़ों खर्च कर जच्चा-बच्चा अस्पताल बनाया गया है, जहां गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी व बाद में बीमार नवजात बच्चों के लिए स्पैशल वार्ड तैयार किया गया है, ताकि लोग इसका लाभ ले सकें, लेकिन यहां इसके उल्ट कार्य हो रहा है। अस्पताल में कमीशनखोरी के चक्कर में नवजात बच्चों को फुटबाल चौक के पास एक प्राइवेट अस्पताल को रैफर किया जा रहा है। हालात तो यह देखने को मिल रहे हैं कि नवजात बच्चे के परिजन कर्जा उठाकर प्राइवेट अस्पताल वालों द्वारा बनाए जाने वाले मोटे बिल का भुगतान कर रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक सिविल अस्पताल में इन दिनों उक्त प्राइवेट अस्पताल की एम्बुलैंस दिन में करीब 2 बार चक्कर लगाते देखी जा सकती है। एम्बुलैंस में एक स्टाफ व आक्सीजन का सिलैंडर तैयार रहता है। दरअसल अस्पताल के ही कथित तौर पर कुछ सरकारी मुलाजिम यह काम कमीशनखोरी के चलते कर रहे हैं। अस्पताल में बीमार नवजात बच्चों के परिजनों की पहले हिस्ट्री ली जाती है कि वह क्या काम करते हैं, यदि लेबर क्लास के लोग हैं तो नवजात बच्चे का उपचार यहीं कर दिया जाता है। यदि पता चले कि बीमार बच्चे के परिजन पैसे खर्च कर सकते हैं तो उन्हें यह कहकर डरा दिया जाता है कि अस्पताल में मशीनों की कमी है और नवजात बच्चे की जान बचाने के लिए उसे उक्त अस्पताल लेकर जाना पड़ेगा, ताकि बच्चे की जान बच जाए।

बस परिजनों द्वारा हां करने पर तुरंत ही अस्पताल के डाक्टर को फोन काल जाती है और कुछ ही देरी में अस्पताल से एम्बुलैंस सिविल अस्पताल में आती है। हाथ में प्लास्टिक की टोकरी उठाकर नर्स बच्चे को एम्बुलैंस में डालकर ले जाती है। सोमवार देर शाम भी नकोदर से जालंधर सिविल अस्पताल रैफर किए नवजात बच्चे के परिजनों को उक्त प्राइवेट अस्पताल की एम्बुलैंस में लेकर गई है। नकोदर से आए परिजनों को पता तक नहीं था कि जालंधर में यह प्राइवेट अस्पताल कहां है?

1 लाख तक बनता है बिल
अस्पताल में तैनात एक स्टाफ ने नाम न छापने पर बताया कि बच्चे के उपचार दौरान प्राइवेट अस्पताल वाले करीब 1 लाख तक का बिल बना देते हैं और उसे रैफर करने वाले को कमीशन के तौर पर 20 से लेकर 25 प्रतिशत तक हिस्सा मिल जाता है। यदि ऐसे सरकारी मुलाजिमों की फोन की काल डिटेल निकाली जाए को सारी कहानी साफ हो सकती है। गौर हो कि जच्चा-बच्चा अस्पताल में डिलीवरी के बाद महिलाओं के परिजनों से जबरदस्ती बधाई मांगने वाले कई मामलों में अस्पताल सुर्खियों में रह चुका है। जरूरत है कि चंडीगढ़ में बैठे सीनियर अधिकारियों को इस मामले में जांच करवाकर ऐसा काम करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

आशा वर्कर या एम्बुलैंस वालों की होती होगी भूमिका : डा. मनीष
बच्चा रोग विशेषज्ञ डा. मनीष का कहना था कि ऐसे मामले में या तो आशा वर्कर शामिल होती है या फिर अस्पताल में सक्रिय प्राइवेट एम्बुलैंस वाले जोकि कमीशनखोरी के चक्कर में सिविल अस्पताल से नवजात बच्चों को प्राइवेट अस्पतालों में ले जाकर पैसे कमाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में आशा वर्कर या एम्बुलैंस वालों की बच्चों को रैफर करवाने में भूमिका होती होगी। 

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