सेवा केंद्रों में ‘सेवा’ गायब, फाइलों पर कुंडली मारकर बैठा सिस्टम! भटक रहे सैकड़ों लोग

Edited By Kalash,Updated: 03 Sep, 2026 01:56 PM

sewa kendra jalandhar

जिला जालंधर में 35 सेवा केंद्रों के जरिए लोगों को करीब 450 सरकारी सेवाएं उपलब्ध करवाने के सरकारी दावे अब कागजों तक सिमटते नजर आ रहे हैं।

जालंधर (चोपड़ा): जिला जालंधर में 35 सेवा केंद्रों के जरिए लोगों को करीब 450 सरकारी सेवाएं उपलब्ध करवाने के सरकारी दावे अब कागजों तक सिमटते नजर आ रहे हैं। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि सेवा केंद्रों के माध्यम से तीन-तीन महीने पहले आवेदन करने के बावजूद सैकड़ों लोगों को एस.सी., इंकम, जन्म-मृत्यु, मैरिज, रेजिडेंट, हेल्थ व अन्य जरूरी सर्टीफिकेट तक नसीब नहीं हो पा रहे। सरकारी सिस्टम से उम्मीद लगाए बैठे लोग अब अपने ही दस्तावेज हासिल करने के लिए रोजाना डिप्टी कमिश्नर कार्यालय के चक्कर काटने को मजबूर हैं। सबसे हैरानीजनक स्थिति यह है कि सेवा केंद्र में आवेदन का स्टेटस पूछने पर आवेदक को तहसीलदार के पास भेज दिया जाता है।

तहसीलदार कार्यालय पहुंचने पर कर्मचारी पटवारी के पास जाने को कहते हैं और पटवारी की ओर से तहसीलदार कार्यालय के क्लर्कों से जानकारी लेने की सलाह दे दी जाती है। यानी एक आवेदनकर्त्ता सरकारी दफ्तरों की ऐसी ‘यात्रा’ पर निकलता है, जिसका टिकट तो उसने नहीं लिया, लेकिन चक्कर पूरे करने की गारंटी जरूर मिल जाती है।

प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि संबंधित अधिकारी, पटवारी अथवा कर्मचारी की आई.डी. में फाइल कितने दिनों से पैंडिंग पड़ी है, इसका स्पष्ट जवाब किसी के पास नहीं है। दूसरी ओर तहसीलदार कार्यालय का स्टाफ अपनी सीटों से नदारद दिखाई देता है। लोग घंटों कार्यालयों के बाहर इंतजार करते हैं, लेकिन उन्हें अधिकारी और कर्मचारी ढूंढे नहीं मिलते।

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उल्लेखनीय है कि भीषण गर्मी के बावजूद रोजाना सैकड़ों लोग डीसी ऑफिस पहुंच रहे हैं। किसी को अपने बच्चे का सर्टीफिकेट कॉलेज में जमा करवाना है तो कोई एस.आई.आर. के दौरान वोट कटने से बचाने के लिए जरूरी दस्तावेज हासिल करना चाहता है। मगर सरकारी दफ्तरों में उनकी समस्या सुनने वाला ही नजर नहीं आता। सुबह उम्मीद लेकर पहुंचने वाले अनेक लोग घंटों धक्के खाने के बाद बैरंग लौटने को मजबूर हैं।

ई-सेवाओं को लेकर डी.सी. ऑफिस से संबंधित सेवाओं का यदि यह हाल है तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि सेवा केंद्रों के जरिए ट्रांसपोर्ट विभाग, पावरकॉम, नगर निगम सहित अन्य सरकारी विभागों से मिलने वाली सेवाओं को लेकर आम जनता को किस कदर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा होगा। सवाल यह भी है कि जब जिला मुख्यालय पर ही व्यवस्था बेपटरी है तो बाकी विभागों की मॉनिटरिंग और जवाबदेही की स्थिति क्या होगी?

पहले नागरिक सेवाओं में जालंधर नंबर-1, अब पैंडेंसी में 23वें स्थान तक फिसला 

एक समय तत्कालीन डिप्टी कमिश्नरों घनश्याम थोरी और डिप्टी कमिश्नर विशेष सारंगल के कार्यकाल में नागरिक सेवाओं की डिलीवरी को लेकर जालंधर जिला प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन के लिए पहले स्थान पर जाना जाता था। मगर मौजूदा व्यवस्था में हालात इसके बिल्कुल विपरीत नजर आ रहे हैं। पैंडेंसी के मामले में जालंधर 23वें पायदान तक पहुंच चुका है। ई-सेवा पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार जिले में एक लाख से ज्यादा फाइलें अप्रूवल के लिए लंबित हैं, जबकि आवेदनों की पेंडेंसी 17.70 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है। इसके बावजूद ऐसा प्रतीत होता है कि इस गंभीर स्थिति को लेकर न तो डिप्टी कमिश्नर व उच्च अधिकारी गंभीर है और ना ही जिम्मेदार व संबंधित अधीनस्थ अधिकारी संजीदा रोल अदा कर रहे है।

डिप्टी कमिश्नर की मॉनिटरिंग आखिर कहां है? 

इतनी बड़ी संख्या में फाइलें महीनों से लंबित हैं तो उनकी रोजाना समीक्षा कौन कर रहा है? किस अधिकारी की आई.डी. में कितनी फाइलें पड़ी हैं? कौन सा पटवारी कितने आवेदन रोके बैठा है? किस क्लर्क की आई.डी में कितनी तादाद में व आखिर क्यों फाइलें अटकी हुई हैं? क्या डिप्टी कमिश्नर स्तर पर पैंडेंसी की नियमित समीक्षा हो रही है? क्या संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को लक्ष्य देकर फाइलें निपटाने की जवाबदेही तय की गई है? अगर मॉनिटरिंग हो रही है तो पैडेंसी में जिला 23 वें पायदान तक कैसे पंहुचा और अगर मॉनिटरिंग नहीं हो रही तो फिर जनता की शिकायतें सुनेगा कौन?

तहसीलदार का अजीबोगरीब तर्क-लोग कर्मचारियों को नाहक परेशान करते हैं, इसलिए कहीं और बैठ काम कर रहे

इस पूरे मामले को लेकर जब तहसीलदार जालंधर-1 स्वप्नदीप कौर से बात की गई और पूछा गया कि उनके स्टाफ के कर्मचारी अपनी सीटों पर दिन भर क्यों नजर नहीं आते तथा पब्लिक डीलिंग के दौरान कार्यालय में उनकी मौजूदगी क्यों नहीं रहती तो उनका अजीबोगरीब जवाब भी व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल खड़े करने वाला रहा। तहसीलदार का कहना था कि लोग सर्टीफिकेट के संबंध में उनके कर्मचारियों को नाहक परेशान करते हैं, जिससे कर्मचारियों के काम में विघ्न पड़ता है।

इसी कारण सर्टिफिकेट और अन्य कामों की ड्यूटी निभाने वाले कर्मचारियों को उन्होंने कार्यालय से बाहर कहीं और बैठा रखा है। जब ‘बाहर’ बैठाए गए कर्मचारियों के स्थान के बारे में जानकारी मांगी गई तो तहसीलदार ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी डी.सी. ऑफिस में ही कहीं बाहर बैठकर काम कर रहे हैं। तहसीलदार-1 ने यह भी कहा कि एस.आई.आर. की ड्यूटी लगी होने के कारण वह कई बार कार्यालय में मौजूद नहीं रहतीं।

जनता परेशान, एजैंटों की चांदी! 

सरकारी व्यवस्था की इस कथित सुस्ती का सबसे बड़ा फायदा अब एजैंटराज को मिलता दिखाई दे रहा है। जहां आम व्यक्ति महीनों से अपनी फाइल और सर्टीफिकेट के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहा है, वहीं एजैंटों के जरिए काम करवाने वालों की फाइलें अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ने की चर्चाएं आम हैं।

लोगों का आरोप है कि सरकारी प्रक्रिया इतनी उलझा दी गई है कि आम आवेदक को आखिरकार एजैंट का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जिस काम के लिए सरकार ने सेवा केंद्र बनाए हैं, उसी काम के लिए जनता को दलालों और बिचौलियों के दरवाजे तक पहुंचना पड़ रहा है। स्थिति यह बन चुकी है कि आम आदमी घंटों लाइन और दफ्तरों के चक्कर काटता रहे, जबकि ‘जेब गर्म’ करने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति अपना काम पहले करवाने की उम्मीद लगाए बैठे। यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि पूरी नागरिक सेवा व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।

सरकार योजनाओं से वोट जोड़ रही, अफसरशाही व्यवस्था से वोट काट रही? 

पंजाब सरकार एक ओर मुफ्त बिजली, महिलाओं को आर्थिक सहायता सहित विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के जरिए आम जनता को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी ओर अधीनस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित लापरवाही सरकार के इन प्रयासों पर पानी फेरती नजर आ रही है।

जनता के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ तभी सार्थक है जब उन्हें प्रमाणित करने वाले जरूरी दस्तावेज समय पर मिलें। जब एक सर्टीफिकेट के लिए नागरिक को तीन महीने तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें तो फिर सवाल केवल पैंडेंसी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का बन जाता है। अब देखना यह है कि लंबित फाइलों और पैंडेंसी को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करता है या फिर जनता इसी तरह सेवा केंद्र से तहसीलदार, तहसीलदार से पटवारी और पटवारी से क्लर्क तक ‘सरकारी चक्कर यात्रा’ करती रहेगी।

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