Photos: सतलुज ने दिखाया हर तरफ तबाही का मंजर, फिर हुई शांत

Edited By Vatika,Updated: 21 Aug, 2019 10:43 AM

relief in people due to low water level in sutlej darya

सतलुज दरिया में पानी तो सामान्य हो गया लेकिन पीछे तबाही के निशान छोड़ गया। पानी कम होते ही लोग दोबारा अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए घरों की तरफ  लौटने शुरू हो गए हैं।

फिल्लौर (भाखड़ी): सतलुज दरिया में पानी तो सामान्य हो गया लेकिन पीछे तबाही के निशान छोड़ गया। पानी कम होते ही लोग दोबारा अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए घरों की तरफ  लौटने शुरू हो गए हैं। इंसानों और उनके मवेशियों के खाने हेतु एक भी दाना नहीं बचा और न ही पानी।
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सतलुज दरिया में पानी का जल स्तर बढऩे से फिल्लौर के जिन 30 गांव में बाढ़ आई थी उनमें पानी के नीचे उतरने के बाद हुई तबाही के निशान अब साफ  दिखाई देने शुरू हो गए हैं। बाढ़ से सबसे ज्यादा नुक्सान गांव भोलेवाल कदीम, मोतीपुर खालसा, मौ साहिब, मियोंवाल, भोलेवाल में हुआ जहां पानी ने लोगों को अपने घरों से सामान निकालने का समय भी नहीं दिया और उनका घर में पड़ा पूरा सामान खत्म हो गया। घरों की दीवारों पर 6 से 7 फुट उपर बाढ़ के पानी का कीचड़ चिपका हुआ है। यही हाल जमीन का है जहां कीचड़ में पैदा चलना भी मुश्किल है। गांव वासियों ने बताया कि उनके घरों में खाने के लिए अनाज का एक भी दाना नहीं बचा। जो फसल और सब्जियां खेतों में लगाई थीं वे पूरी तरह से तबाह हो चुकी हैं। कुएं भी दूषित हो गए हैं जिनका पानी पीने के बिल्कुल काबिल नहीं है। कुछ घरों में नीचे से जमीन धंसने से दरारें आ गई हैं और कुछ घर गिरने की कगार पर हैं। 
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प्रशासन ने राहत कैम्प तो बनाए पर इंतजाम शून्य के बराबर 
गांव के स्कूल में प्रशासन द्वारा बनाए राहत कैम्प में शरण लिए बैठे लोगों ने बताया कि प्रशासन ने स्कूलों में उनके ठहरने का इंतजाम तो करवा दिया परंतु न तो उनके खाने और न ही सोने के लिए बिस्तरों का कोई खास इंतजाम करवाया। जिन गांव में बाढ़ का पानी नहीं पहुंचा वहां के निवासी और गुरुद्वारों से लोग उनके खाने के लिए खुद ही लंगर भेज रहे हैं और कुछ लोग उनके मवेशियों के लिए चारा ला रहे हैं। खुले आसमान में बिना बिजली के वे रात गुजारने को मजबूर हैं। प्रशासन ने राहत कैम्पों में लोगों के रहने के इंतजाम शून्य के बराबर किए।

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रात को सो रहे लोगों पर कहर बन कर टूटा बाढ़ का पानी
राहत कैम्प में रह रही महिला कुलबीर कौर, परमजीत कौर और गुरमेल कौर ने बताया कि वे अपने घरों में सो रहे थे। रात्रि & बजे उनके गांव भोलवाल कदीम में दरिया का पानी इतनी तेजी से उनके घरों में आया कि लोग सब कुछ वहीं छोड़ मवेशियों को साथ लेकर किसी तरह जान बचा कर परिवारों सहित निकलने में कामयाब हो गए। उन्होंने तो अगले रोज खाना खाने के लिए बर्तन भी लोगों से मांग कर लिए, उनका गांव पूरी तरह से बर्बाद हो गया। ब‘चों को स्कूल भेजने के लिए न तो वर्दी बची और न ही किताबें। उन्हें समझ नहीं आ रहा वे अपनी जिंदगी दोबारा कैसे शुरू करेंगे। ऐसा ही हाल दूसरे गांव वासियों का भी था। 

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बाढ़ ग्रस्त गांवों में बीमारी फैलने का डर
गांव वासी सुखदेव सिंह, गुरदियाल सिंह, चमन लाल व अमरीक सिंह ने बताया कि बाढ़ का पानी उनके लिए बर्बादी तो लेकर आया ही साथ में कई घातक बीमारियां भी लाया है। उन्होंने बताया कि दरिया के किनारे पर प्रदेश की सबसे बड़ी मृतक जानवरों की हड्डारोड़ी थी जहां पर मरे हुए जानवरों को लाकर उनकी खाल उतारी जाती थी। बाढ़ के इस पानी के कारण हजारों की संख्या में मृतक जानवरों की चमड़ी और हड्डियां उनके खेतों व घरों के अंदर आ गई हैं जिससे भयानक बदबू निकल रही है। इसके अलावा खेतों में फसलों को बचाने के लिए किसानों द्वारा जिन जहरीली दवाइयों का छिड़काव किया गया था वह भी अब इस पानी में घुल कर उनके घरों में घूम रहा है। इससे घरों की साफ -सफाई कर रहे लोगों को चमड़ी के रोग व अन्य भयानक बीमारियां लग सकती हैं। प्रशासन को बाढ़ ग्रस्त सभी गांव में अधिक संख्या में डाक्टरों की टीमें भेजनी चाहिए। 

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