DC ऑफिस में बाल भिक्षावृत्ति ने खोली पोल, सवालों  के घेरे में  टास्क फोर्स की छापेमारी?

Edited By Urmila,Updated: 08 Jan, 2026 10:38 AM

questions raised about the task force s raids on child begging

बाल भिक्षावृत्ति रोकू टास्क फोर्स की ओर से शहर में छापेमारी कर यह दावा किया गया कि कहीं भी कोई बच्चा भीख मांगता नहीं मिला।

जालंधर (चोपड़ा) : बाल भिक्षावृत्ति रोकू टास्क फोर्स की ओर से शहर में छापेमारी कर यह दावा किया गया कि कहीं भी कोई बच्चा भीख मांगता नहीं मिला। जिला प्रोग्राम अधिकारी मनजिंदर सिंह द्वारा विगत कल ही जारी प्रैस नोट में इसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया गया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि ठीक अगले ही दिन डिप्टी कमिश्नर कार्यालय परिसर में बड़ी संख्या में बच्चे जगह-जगह भीख मांगते दिखाई दिए। यह दृश्य न केवल सरकारी दावों की पोल खोलता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि जमीनी हकीकत और फाइलों में दर्ज ‘सफलता’ के बीच कितनी गहरी खाई है।

डिप्टी कमिश्नर कार्यालय किसी भी जिले का प्रशासनिक हृदय होता है। यहीं से कानून व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, बाल संरक्षण और जनकल्याण से जुड़े फैसले लिए जाते हैं। लेकिन यही परिसर आज बाल भिक्षावृत्ति का सुरक्षित अड्डा बनता नजर आया। रोजाना सरकारी अधिकारियों के कार्यालयों के बाहर व भीतर छोटे-छोटे बच्चे, फटे कपड़े, हाथ फैलाए हुए दिखाई देते हैं और काम्प्लैक्स में विभिन्न कामों को कराने आने वाले लोगों व कर्मचारियों से भीख मांगते नजर आते हैं परंतु सवाल यह है कि क्या यह सब अधिकारियों की नजरों से छिपा हुआ है? या फिर सब कुछ दिखते हुए भी ‘न दिखने’ का नाटक किया जा रहा है?

उच्च अधिकारियों की मौजूदगी, फिर भी बेखौफ बाल भिक्षावृत्ति

डी.सी. ऑफिस परिसर में केवल डिप्टी कमिश्नर ही नहीं, बल्कि एडीशनल डिप्टी कमिश्नर, एस.डी.एम., सहायक कमिश्नर, मुख्यमंत्री फील्ड ऑफिसर, तहसीलदार, नायब तहसीलदार सहित अनेक वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा पुलिस कमिश्नर व कमिश्नरेट अधिकारियों के कार्यालय स्थित हैं। इसके अलावा सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मचारी, अधिकारियों के साथ तैनात पुलिस सुरक्षा कर्मचारी और अन्य स्टाफ भी हर वक्त मौजूद रहता है। बावजूद इसके, बच्चों से दिनभर भीख मंगवाई जा रही है। यह स्थिति साफ तौर पर प्रशासनिक लापरवाही और उदासीनता की ओर इशारा करती है।

Child begging

टास्क फोर्स की छापेमारी आई सवालों के घेरे में

जिला प्रोग्राम अधिकारी द्वारा दावा किया गया है कि शहर में छापेमारी के दौरान कोई भी बच्चा भीख मांगता नहीं पाया गया। यदि यह सच है, तो डी.सी. आफिस परिसर में दिख रहे बच्चे कहां से आए? क्या छापेमारी केवल चुनिंदा जगहों तक सीमित थी? क्या प्रशासन ने जानबूझकर उन इलाकों को नजरअंदाज किया, जहां सच्चाई सामने आने का डर था? ये सवाल अब आम लोगों की जुबान पर हैं।

 ‘जागरूकता’ के दावे और जमीनी सच्चाई

विगत कल जिला प्रोग्राम अधिकारी द्वारा यह भी बताया गया कि लोगों को बच्चों के अधिकारों, शिक्षा की महत्ता, बाल मजदूरी, बाल भिक्षावृत्ति और यौन शोषण के खिलाफ जागरूक किया गया। लेकिन यदि जागरूकता सचमुच प्रभावी होती, तो डी.सी. आफिस जैसे संवेदनशील और निगरानी वाले इलाके में बाल भिक्षावृत्ति कैसे फल-फूल रही होती? हकीकत यह है कि जागरूकता के पोस्टर और भाषण फाइलों में अच्छे लगते हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर न के बराबर दिखाई देता है।

चाइल्ड हैल्पलाइन 1098: कागजों में सक्रिय, हकीकत में लाचार?

लोगों से अपील की गई है कि बाल भिक्षावृत्ति या संकट में फंसे बच्चों की सूचना चाइल्ड हैल्पलाइन 1098 पर दें। लेकिन जब प्रशासनिक मुख्यालय में ही यह अपराध खुलेआम हो रहा हो, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? क्या हर बार जनता ही सूचना देगी और जिम्मेदार विभाग कर्मी आंखें मूंदे बैठे रहेंगे?

पहले भी बच्चे हुए रैस्क्यू, फिर समस्या जस की तस

यह भी कहा गया कि इससे पहले कई इलाकों में बच्चों को रैस्क्यू किया गया। सवाल यह है कि रैस्क्यू के बाद क्या हुआ? क्या उन बच्चों का पुनर्वास हुआ? क्या उन्हें शिक्षा और सुरक्षित भविष्य मिला? या फिर कुछ दिनों बाद वही बच्चे दोबारा सड़कों पर उतार दिए गए? यदि रैस्क्यू स्थायी समाधान नहीं दे पा रहा, तो फिर दावे किस काम के?

प्रशासन पर तीखा कटाक्ष, चिराग तले अंधेरा

बाल भिक्षावृत्ति को रोकने का दावा करने वाला प्रशासन अपने ही दफ्तर के बाहर फैली सच्चाई नहीं देख पा रहा या कहें कि देखना नहीं चाहता। यह वही स्थिति है, जिसे कहावत में कहा गया है ‘चिराग तले अंधेरा’। कानून बनाने और लागू कराने वाले जब खुद ही आंखें बंद कर लें, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है। वहीं डिप्टी कमिश्नर कार्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि वे इन बच्चों द्वारा कराई जा रही भिक्षावृत्ति से खुद बेहद परेशान हैं।

आखिर कौन जिम्मेदार और जवाबदेही कब?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। क्या जिला प्रोग्राम अधिकारी अपने दावों की जिम्मेदारी लेंगे? क्या डी.सी. कार्यालय परिसर में बाल भिक्षावृत्ति पर तुरंत कार्रवाई होगी? या फिर एक और प्रैस नोट जारी कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

डी.सी. ऑफिस में संगठित गिरोह द्वारा बाल भिक्षावृत्ति कराने की आशंका

आज डिप्टी कमिश्नर कार्यालय परिसर में एक वृद्ध महिला के साथ करीब दर्जनभर छोटे बच्चों को भीख मांगते देखा गया। एक ही महिला के साथ इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या ये सभी बच्चे उसी महिला के हैं या फिर डी.सी. आफिस में भी बच्चों से भीख मंगवाने वाला कोई संगठित गिरोह सक्रिय है? यह दृश्य सामान्य गरीबी का नहीं, बल्कि योजनाबद्ध बाल भिक्षावृत्ति की ओर इशारा करता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब प्रशासनिक मुख्यालय में खुलेआम हो रहा है, जहां वरिष्ठ अधिकारी, पुलिस और सुरक्षा कर्मी मौजूद रहते हैं। इसके बावजूद कोई कार्रवाई न होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

बाल भिक्षावृत्ति केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक असफलता का आईना: एडवोकेट अनूप गौतम

वहीं एडवोकेट अनूप गौतम का इस मामले में कहा है कि बाल भिक्षावृत्ति केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक असफलता का आईना है। जब जिले के सबसे सुरक्षित और निगरानी वाले इलाके में यह अपराध खुलेआम हो, तो यह साफ संकेत है कि कहीं न कहीं सिस्टम फेल हो चुका है। अब जरूरत है दिखावटी छापेमारी और खोखले दावों से आगे बढ़कर ठोस, ईमानदार और जवाबदेह कार्रवाई की, वरना बच्चों का भविष्य और कानून, दोनों यूं ही भीख मांगते रहेंगे।

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